Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 16 / Mantra 50

66 Mantra
16/50
Devata- रुद्रा देवताः Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्वा देवा ऋषयः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
परि॑ नो रु॒द्रस्य॑ हे॒तिर्वृ॑णक्तु॒ परि॑ त्वे॒षस्य॑ दुर्म॒तिर॑घा॒योः। अव॑ स्थि॒रा म॒घव॑द्भ्यस्तनुष्व॒ मीढ्व॑स्तो॒काय॒ तन॑याय मृड॥५०॥

परि॑। नः॒। रु॒द्रस्य॑। हे॒तिः। वृ॒ण॒क्तु॒। परि॑। त्वे॒षस्य॑। दु॒र्म॒तिरिति॑ दुःऽम॒तिः। अ॒घा॒योः। अ॒घा॒योरित्य॑घ॒ऽयोः। अव॑। स्थि॒रा। म॒घव॑द्भ्य॒ इति॑ म॒घव॑त्ऽभ्यः। त॒नु॒ष्व॒। मीढ्वः॑। तो॒काय॑। तन॑याय। मृ॒ड॒ ॥५० ॥

Mantra without Swara
परि नो रुद्रस्य हेतिर्वृणक्तु परि त्वेषस्य दुर्मतिरघायोः । अव स्थिरा मघवद्भ्यस्तनुष्व मीढ्वस्तोकाय तनयाय मृड ॥

परि। नः। रुद्रस्य। हेतिः। वृणक्तु। परि। त्वेषस्य। दुर्मतिरिति दुःऽमतिः। अघायोः। अघायोरित्यघऽयोः। अव। स्थिरा। मघवद्भ्य इति मघवत्ऽभ्यः। तनुष्व। मीढ्वः। तोकाय। तनयाय। मृड॥५०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (नः) = हमें (रुद्रस्य) = अन्यायकारियों को रुलानेवाले (रोदयति) राजा का (हेतिः) = अस्त्र (परिवृणक्तु) = छोड़ दे। हमपर दण्ड देनेवाले राजा का वज्र न गिरे, अर्थात् हम राजनियमों का पालन करते हुए राजा के प्रकोप से बचे रहें। २. और इस राजा की उचित व्यवस्था से हमें (त्वेषस्य) = [त्वेषति क्रोधेन ज्वलति, red with anger] क्रोध की ज्वाला से तमतमाते हुए (अघायोः) [अघं परस्य इच्छति] = सदा औरों का अशुभ चाहनेवाले अघायु पुरुष की (दुर्मतिः) = बुरी बुद्धि (परि) = [वृणक्तु] छोड़ दे। हम उसकी बुरी बुद्धि का शिकार न हो जाएँ, अर्थात् उत्तम राष्ट्र-व्यवस्था के परिणामस्वरूप दुष्ट लोग सज्जनों को पीड़ित न कर पाएँ। ३. (स्थिरा) = अपने दृढ़ शस्त्रों को तू (मघवद्भ्यः) = [मघ - मख] यज्ञशील जीवनवालों के लिए (अवतनुष्व) = शिथिल कर दे - धनुष की डोरी को उतार दे । ४. (मीढ्वः) = हे सब सुखों की वर्षा करनेवाले राजन् ! तू (तोकाय) = हमारी सन्तानों के लिए तथा (तनयाय) = सन्तानों की भी सन्तानों के लिए (मृड) = सुख देनेवाला हो ।
Essence
भावार्थ - राजा राष्ट्र में ऐसी उत्तम दण्ड - व्यवस्था करे कि दुर्जन सज्जनों को तङ्ग न कर सकें। यज्ञशीलों पर दण्डपात न हो।
Subject
दण्ड व अपराध-शून्यता