Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 16 / Mantra 46

66 Mantra
16/46
Devata- रुद्रा देवताः Rishi- परमेष्ठी प्रजापतिर्वा देवा ऋषयः Chhand- स्वराट् प्रकृतिः Swara- धैवतः
Mantra with Swara
नमः॑ प॒र्णाय॑ च पर्णश॒दाय॑ च॒ नम॑ऽउद्गु॒रमा॑णाय चाभिघ्न॒ते च॒ नम॑ऽआखिद॒ते च॑ प्रखिद॒ते च॒ नम॑ऽइषु॒कृद्भ्यो॑ धनु॒ष्कृद्भ्य॑श्च वो॒ नमो॒ नमो॑ वः किरि॒कभ्यो॑ दे॒वाना॒ हृद॑येभ्यो॒ नमो॑ विचिन्व॒त्केभ्यो॒ नमो॑ विक्षिण॒त्केभ्यो॒ नम॑ऽआनिर्ह॒तेभ्यः॑॥४६॥

नमः॑। प॒र्णाय॑। च॒। प॒र्ण॒श॒दायेति॑ पर्णऽश॒दाय॑। च॒। नमः॑। उ॒द्गु॒रमा॑णा॒येत्यु॑त्ऽगु॒रमा॑णाय। च॒। अ॒भि॒घ्न॒त इत्य॑भिऽघ्न॒ते। च॒। नमः॑। आ॒खि॒द॒त इत्या॑ऽखि॒द॒ते। च॒। प्र॒खि॒द॒त इति॑ प्रऽखिद॒ते। च॒। नमः॑। इ॒षु॒कृद्भ्य॒ इती॑षु॒कृत्ऽभ्यः॑। ध॒नु॒ष्कृद्भ्यः॑। ध॒नुः॒ऽकृद्भ्य॒ इति॑ धनुः॒कृत्ऽभ्यः॑। च॒। वः॒। नमः॑। नमः॑। वः॒। कि॒रि॒केभ्यः॑। दे॒वाना॑म्। हृद॑येभ्यः। नमः॑। वि॒चि॒न्व॒त्केभ्य॒ इति॑ विऽचिन्व॒त्केभ्यः॑। नमः॑। वि॒क्षि॒ण॒त्केभ्य॒ इति॑ विऽक्षिण॒त्केभ्यः॑। नमः॑। आ॒नि॒र्ह॒तेभ्य॒ इत्या॑निःऽह॒तेभ्यः॑ ॥४६ ॥

Mantra without Swara
नमः पर्णाय च पर्णशदाय च नम उद्गुरमाणाय चाभिघ्नते च नम आखिदते च प्रखिदते च नमऽइषुकृद्भ्यो धनुष्कृद्भ्यस्च वो नमो नमो वः किरिकेभ्यो देवानाँ हृदयेभ्यो नमो विचिन्वत्केभ्यो नमो विक्षिणत्केभ्यो नमऽआनिर्हतेभ्यः ॥

नमः। पर्णाय। च। पर्णशदायेति पर्णऽशदाय। च। नमः। उद्गुरमाणायेत्युत्ऽगुरमाणाय। च। अभिघ्नत इत्यभिऽघ्नते। च। नमः। आखिदत इत्याऽखिदते। च। प्रखिदत इति प्रऽखिदते। च। नमः। इषुकृद्भ्य इतीषुकृत्ऽभ्यः। धनुष्कृद्भ्यः। धनुःऽकृद्भ्य इति धनुःकृत्ऽभ्यः। च। वः। नमः। नमः। वः। किरिकेभ्यः। देवानाम्। हृदयेभ्यः। नमः। विचिन्वत्केभ्य इति विऽचिन्वत्केभ्यः। नमः। विक्षिणत्केभ्य इति विऽक्षिणत्केभ्यः। नमः। आनिर्हतेभ्य इत्यानिःऽहतेभ्यः॥४६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (पर्णाय च नमः) = सोमादि ओषधियों के पत्तों के व्यापारी का आदर हो, (च) = और (पर्णशदाय) = इन पत्तों को काटकर लानेवाले के लिए आदर हो । २. (उद्गुरमाणाय) = काष्ठभार उठानेवाले के लिए सत्कार हो, (च) = और (अभिघ्नते) = काष्ठछेदक [wood cutter] के लिए आदर हो । ३. (आखिदते च नमः) = खेतों को चर जानेवाले पशुओं को खदेड़नेवालों, अर्थात् क्षेत्ररक्षकों का भी हम आदर करते हैं (च) = और (प्रखिदते च नमः) = तोते आदि पक्षियों के खदेड़ने [खिद= To strike] से बागों की रक्षा करनेवालों का हम आदर करते हैं। ४. (इषुकृद्भ्यः च नमः) = बाणों के बनानेवालों का हम आदर करते हैं, (च) = और (धनुष्कृद्भ्यः) = धनुष् बनानेवालों का भी हम मान करते हैं। ५. (किरिकेभ्यः वः नमः) = [कुर्वन्ति इति - उ०] विविध वस्तुओं के निर्माता आप सबका हम आदर करते हैं । ६. (देवानां हृदयेभ्यः नमः) = देवताओं के हृदयवालों के लिए, अर्थात् जिनका हृदय आसुर भावनाओंवाला न होकर दैवी भावनाओं से भरा है उनके लिए हम नमस्कार करते हैं। ७. देव- हृदयवाला बनने के लिए (विचिन्वत्केभ्यः) = अपने हृदय में दैव व आसुर भावनाओं का विवेचन करनेवालों के लिए आदर हो । सदा हृदय की पड़ताल करनेवालों का हम सम्मान करें। ८. आसुर भावनाओं का (विक्षिणत्केभ्यः) = विशेषरूप से [क्षिण्वन्ति हिंसन्ति] हिंसन करनेवालों का आदर हो । ९. (आनिर्हतेभ्यः नमः) = [आ समन्तात् निर्हतं येषां] समन्तात् इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि-सबमें से इन कामादि को दूर भगा देनेवालों का हम आदर करें। ७, ८, ९ की भावना बाह्य शत्रुओं के विषय में भी हो सकती है कि छिपे हुए शत्रुओं को ढूँढनेवालों, उनका हिंसन करनेवालों व समन्तात् दूर भगा देनेवालों का हम आदर करते हैं।
Essence
भावार्थ - ओषधि-विक्रेताओं, क्षेत्र - रक्षकों, शस्त्र-निर्माताओं तथा विविध शिल्पियों और निर्मल हृदयवाले, आत्म-निरीक्षण के अभ्यासियों का हम आदर करते हैं।
Subject
ओषधि विक्रेता व काष्ठवाहक