Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 16 / Mantra 4

66 Mantra
16/4
Devata- रुद्रो देवता Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- निचृदार्ष्यनुस्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
शि॒वेन॒ वच॑सा॒ त्वा॒ गिरि॒शाच्छा॑ वदामसि। यथा॑ नः॒ सर्व॒मिज्जग॑दय॒क्ष्म सु॒मना॒ऽअस॑त्॥४॥

शि॒वेन॑। वच॑सा। त्वा॒। गिरि॒शेति॒ गिरि॑ऽश। अच्छ॑। व॒दा॒म॒सि॒। यथा॑। नः॒। सर्व॑म्। इत्। जग॑त्। अ॒य॒क्ष्मम्। सु॒मना॒ इति॑ सु॒ऽमनाः॑। अस॑त् ॥४ ॥

Mantra without Swara
शिवेन वचसा त्वा गिरिशाच्छा वदामसि । यथा नः सर्वमिज्जगदयक्ष्मँ सुमना असत् ॥

शिवेन। वचसा। त्वा। गिरिशेति गिरिऽश। अच्छ। वदामसि। यथा। नः। सर्वम्। इत्। जगत्। अयक्ष्मम्। सुमना इति सुऽमनाः। असत्॥४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (गिरिश) = वेदवाणी में निवास करनेवाले प्रभो! सारी वाणियाँ आपका ही वर्णन कर रही हैं 'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति'। हम (शिवेन वचसा) = इस कल्याणकारिणी वेदवाणी से (त्वा अच्छ) = [अच्छ अभेदाप्तुम् इति शाकपूणिः- नि० ५।२८] आपको प्राप्त करने के लिए (वदामसि) = प्रार्थना करते हैं। अथवा इस वेदवाणी के अनुसार अपने जीवन को बनाते हुए, वेदवाणी को जीवन से कहते हुए, आपको प्राप्त करने के लिए यत्नशील होते हैं। आपको प्राप्त करने का उपाय यही है कि हम वेदवाणी के अनुसार अपने जीवन को बनाएँ। २. (यथा) = जिससे (नः) = हमारा (सर्वं इत् जगत्) = सारा ही जगत्-हमारे सब क्रियाशील व्यक्ति (अयक्ष्मम्) = रोग से रहित तथा (सुमना) = उत्तम मनवाले प्रसन्नचित्त (असत्) = हों । वेदवाणी के हमारे जीवनों पर दो परिणाम हैं। यह हमारे शरीरों को व्याधि-शून्य बनाती है [अयक्ष्मम्] तथा मन की आधियों को हरती है [सुमनाः]।
Essence
भावार्थ- हम अपने जीवन को वेदवाणी के अनुसार बनाते हुए प्रभु को प्राप्त करनेवाले बनें। हमारे शरीर व्याधियों से शून्य हों और मन आधियों से ।
Subject
अयक्ष्मं+सुमना