Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 16 / Mantra 2

66 Mantra
16/2
Devata- रुद्रो देवता Rishi- परमेष्ठी वा कुत्स ऋषिः Chhand- स्वराडर्ष्यनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
या ते॑ रुद्र शि॒वा त॒नूरघो॒राऽपा॑पकाशिनी। तया॑ नस्त॒न्वा शन्त॑मया॒ गिरि॑शन्ता॒भि चा॑कशीहि॥२॥

या। ते॒। रु॒द्र॒। शि॒वा। त॒नूः। अघो॑रा। अपा॑पकाशि॒नीत्यपा॑पऽकाशिनी। तया॑। नः॒। त॒न्वा᳕। शन्त॑म॒येति॒ शम्ऽत॑मया। गिरि॑श॒न्तेति॒ गिरि॑ऽशन्त। अ॒भि। चा॒क॒शी॒हि॒ ॥२ ॥

Mantra without Swara
या ते रुद्र शिवा तनूरघोरापापकाशिनी । तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि ॥

या। ते। रुद्र। शिवा। तनूः। अघोरा। अपापकाशिनीत्यपापऽकाशिनी। तया। नः। तन्वा। शन्तमयेति शम्ऽतमया। गिरिशन्तेति गिरिऽशन्त। अभि। चाकशीहि॥२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र के ज्ञान का ही उल्लेख करते हुए कहते हैं कि हे रुद्र ज्ञान देकर दुःखों का द्रावण करनेवाले प्रभो ! (या) = जो (ते) = आपकी (तनूः) = सत्योपेदेशनीति [द०] = सत्योपदेश का मार्ग है वह [क] (शिवा) = अभ्युदय व निःश्रेयस के साधन से सचमुच हमारा कल्याण करनेवाला है। [ख] (अघोरा) = हमारे जीवनों को विषयशून्य व सौम्य बनानेवाला है। [ग] यह सत्योपदेशनीति (अपापकाशिनी) = अपापों को- सत्यधर्मों को ही प्रकाशित करनेवाली है। आपके वेदज्ञान में सत्यधर्म का ही उपदेश है। २. हे (गिरिशन्त) = [ यो गिरिणा सत्योपदेशेन शं सुखं तनोति - द० ] सत्योपदेश की वाणी से सुख व शान्ति का विस्तार करनेवाले प्रभो! [गिरि वाचि स्थितः शं तनोति - म० ] आप इस वाणी के द्वारा परिमित भोजन का उपदेश देते हुए [आज्यं तौलस्य प्राशान घी को तोलकर खाओ, नपा-तुला खाओ] हमें नीरोग व सुखी करते हैं तथा परिमित मधुर बोलने का उपदेश देते हुए [वाचं स्वदतु - स्वादवाली, मधुरवाणी ही बोलो] हमारे जीवनों को कलहों से ऊपर उठाकर शान्त करते हैं। आप (तया तन्वा) = उस सत्योपदेश नीति से जो (नः) = हमारे लिए (शन्तमया) = अधिक-से-अधिक शान्ति का विस्तार करनेवाली है, (अभिचाकशीहि) = हमें देखिए, हमारी रक्षा का ध्यान कीजिए [चाकशीतिः पश्यतिकर्मा - नि० ३।११ देखना = to look after ध्यान करना] ३. हे प्रभो ! आप (गिरिशन्त) = 'गिरीश' वेदवाणी में स्थित होनेवाले तथा 'अन्त' [अमति गच्छति जानाति] सर्वज्ञ हैं। आप सब सत्यविद्याओं की आश्रयभूत, अत्यन्त सुखकारिणी इस वेदवाणी से हमारा पालन कीजिए।
Essence
भावार्थ-उस प्रभु का दिया हुआ ज्ञान 'शिव, अघोर व पुण्य का प्रकाशक' है और शन्तम=अधिक-से-अधिक शान्ति देनेवाला है। इस ज्ञान से ही प्रभु हमारा पालन करते हैं।
Subject
गिरिशन्त