Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 16 / Mantra 18

66 Mantra
16/18
Devata- रुद्रा देवताः Rishi- कुत्स ऋषिः Chhand- निचृदष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
नमो॑ बभ्लु॒शाय॑ व्या॒धिनेऽन्ना॑नां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमो॑ भ॒वस्य॑ हे॒त्यै जग॑तां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमो॑ रु॒द्राया॑तता॒यिने॒ क्षेत्रा॑णां॒ पत॑ये॒ नमो॒ नमः॑ सू॒तायाह॑न्त्यै॒ वना॑नां॒ पत॑ये॒ नमः॑॥१८॥

नमः॑। ब॒भ्लु॒शाय॑। व्या॒धिने॑। अन्ना॑नाम्। पत॑ये। नमः॑। नमः॑। भ॒वस्य॑। हे॒त्यै। जग॑ताम्। पत॑ये। नमः॑। नमः॑। रु॒द्राय॑। आ॒त॒ता॒यिन॒ इत्या॑ततऽआ॒यिने॑। क्षेत्रा॑णाम्। पत॑ये। नमः॑। नमः॑। सू॒ताय॑। अह॑न्त्यै। वना॑नाम्। पत॑ये। नमः॑ ॥१८ ॥

Mantra without Swara
नमो बभ्लुशाय व्याधिनेन्नानां पतये नमो नमो भवस्य हेत्यै जगताम्पतये नमो नमो रुद्रायाततायिने क्षेत्राणाम्पतये नमो नमः सूतायाहन्त्यैवनानां पतये नमो नमो रोहिताय ॥

नमः। बभ्लुशाय। व्याधिने। अन्नानाम्। पतये। नमः। नमः। भवस्य। हेत्यै। जगताम्। पतये। नमः। नमः। रुद्राय। आततायिन इत्याततऽआयिने। क्षेत्राणाम्। पतये। नमः। नमः। सूताय। अहन्त्यै। वनानाम्। पतये। नमः॥१८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (बभ्लुशाय) = [बभ्लुषु राज्यधारकेषु शेते कर्मसु - द०] - सदा राज्यधारक कर्मों में निवास करनेवाले, (व्याधिने) [विध्यति - उ०] = शत्रुओं का वेधन करनेवाले के लिए, राष्ट्र-रक्षा के लिए शत्रुओं का संहार करनेवाले का (नमः) [] हम आदर करते हैं। शत्रु संहार के साथ (अन्नानां पतये) = अन्नों के रक्षक के लिए हम (नमः) = नमस्कार करते हैं। राजा ने जहाँ शत्रु संहार के लिए सेना व अस्त्रादि पर ध्यान देना है वहाँ उसने अन्न की भी पूर्ण व्यवस्था करनी है। शत्रुओं से बची हुई प्रजा कहीं अन्न संकट का शिकार न हो जाए। राष्ट्र में गोलियाँ-हीगोलियाँ [bullets and bullets] न हों, भोजन [ bread] भी हो। २. (भवस्य) = संसार के ऐश्वर्य की [भूतिः भव - ऐश्वर्य] (हेत्यै) = [हि वृद्धौ] वृद्धि करनेवाले का हम (नमः) = आदर करते हैं। राजा का कर्त्तव्य है कि वह राष्ट्र के ऐश्वर्य को बढ़ाए और इस ऐश्वर्य वृद्धि के द्वारा (जगतां पतये नमः) = क्रियाशील पुरुषों की रक्षा करनेवाले के लिए हम नतमस्तक होते हैं। राष्ट्र में कोई भी आलसी, अकर्मण्य व याचक नहीं होना चाहिए। ३. (रुद्राय) = शत्रुओं के रुलानेवाले (आततायिने) = [ आ समन्तात् ततं शत्रुदलमेतुं शीलमस्य - द०] चारों ओर फैले हुए शत्रुदलों पर आक्रमण करनेवाले के लिए हम (नमः) = नमस्कार करते हैं, परन्तु साथ ही (क्षेत्राणां पतये) = अन्न क्षेत्रों की रक्षा करनेवाले को (नमः) = हम आदर देते हैं। शत्रुनाश के साथ क्षेत्रों के नाश होने पर शत्रुनाश से बची हुई प्रजा अन्नाभाव से मृत हो जाएगी । ४. अन्त में (सूताय) = उत्तम प्रेरणा देनेवाले और उस उत्तम प्रेरणा के द्वारा (आहन्त्यै) = न नष्ट होने देनेवाले धर्माध्यक्ष को (नमः) = हम आदर देते हैं। अथवा (सूताय) = उस सारथि के लिए जो (आहन्त्यै) = [हन्=गति] युद्ध में सर्वत्र घोड़ों को ले जानेवाला है हम आदर देते हैं और (वनानाम्) = [Those who win] विजेताओं के (पतये) = मुखिया के लिए (नमः) = हम नतमस्तक होते हैं। अथवा (वनानाम्) = [वन = light] प्रकाश की किरणों के (पतये) = स्वामी के लिए, अर्थात् उत्कृष्ट ज्ञानियों के लिए हम आदर देते हैं। वन 'शब्द का अर्थ घर' भी है। राष्ट्र में घरों के पति [Housing administrator ] के लिए हम आदर देते हैं, उस अध्यक्ष के लिए जिसका काम घरों की उचित व्यवस्था करना है। अथवा वनों - जङ्गलों के रक्षक का हम आदर करते हैं।
Essence
भावार्थ- हम राष्ट्र-रक्षक पुरुषों का उचित आदर करें।
Subject
अन्न क्षेत्र-वन