Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 16 / Mantra 14

66 Mantra
16/14
Devata- रुद्रो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- स्वराडर्ष्यनुष्टुप् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
नम॑स्त॒ऽआयु॑धा॒याना॑तताय धृ॒ष्णवे॑। उ॒भाभ्या॑मु॒त ते॒ नमो॑ बा॒हुभ्यां॒ तव॒ धन्व॑ने॥१४॥

नमः॑। ते॒। आयु॑धाय। अना॑तताय। धृ॒ष्णवे॑। उ॒भाभ्या॑म्। उ॒त। ते॒। नमः॑। बा॒हुभ्या॒मिति॑ बा॒हुऽभ्या॑म्। तव॑। धन्व॑ने ॥१४ ॥

Mantra without Swara
नमस्तऽआयुधायानातताय धृष्णवे । उभाभ्यामुत ते नमो बाहुभ्यान्तव धन्वने ॥

नमः। ते। आयुधाय। अनातताय। धृष्णवे। उभाभ्याम्। उत। ते। नमः। बाहुभ्यामिति बाहुऽभ्याम्। तव। धन्वने॥१४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१.हे राजन्! (ते) = तेरे (धृष्णवे) = धर्षणशील- शत्रुसंहार में निपुण, पर (अनातताय) = जिसकी धनुष पर आरोपित करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती, ऐसे उस (आयुधाय) = आयुध के लिए-शस्त्र समूह के लिए अथवा जो प्रजा को दबाने के लिए कभी धनुष पर आरोपित नहीं किया जाता, उस आयुध के लिए (नमः) = हम नमस्कार करते हैं, उसके महत्त्व की प्रशंसा करते हैं । २. हे राजन् ! (उत) = और (ते) = तेरे (उभाभ्याम्) = दोनों बाहुभ्याम् प्रयत्नों के लिए, अर्थात् बाह्यशत्रुओं के नाश तथा प्रजा रक्षणरूप प्रयत्न के लिए (नमः) = हम तेरा आदर करते हैं। ३. इन दोनों प्रयत्नों में सहायभूत (तव धन्वने) = तेरे इस धनुष के लिए हम आदर करते हैं । ४. यहाँ प्रस्तुत मन्त्र में 'आयुधाय' शब्द से आयुधों का होना तो आवश्यक है परन्तु 'अनातताय' शब्द स्पष्ट कह रहा है कि यथासम्भव इनका प्रयोग न ही करना पड़े। ५. ‘उभाभ्यां बाहुभ्यां' इन शब्दों से राजा के इन दोनों मौलिक कर्त्तव्यों का भी स्पष्ट प्रतिपादन है कि [क] उसने युद्ध द्वारा शत्रुओं को जीतना है, उनके आक्रमणों से देश की रक्षा करनी है, और [ख] प्रजा की अन्तः उपद्रवों से भी रक्षा करनी है। 'सेना पहला कार्य करेगी,' तो राजपुरुष [police] दूसरे कार्य को। राजा के ये दोनों कार्य आदरणीय होते हैं। इन कार्यों के साधक अस्त्र भी आदृत होते हैं।
Essence
भावार्थ- हम 'शत्रुनाशक, राष्ट्ररक्षक' राजा का आदर करें। राष्ट्र की रक्षा करनेवाला राजा ही प्रस्तुत मन्त्रों का ऋषि 'प्रजापति' कहलाने योग्य है।
Subject
अनातत आयुध