Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 16 / Mantra 12

66 Mantra
16/12
Devata- रुद्रो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृदार्ष्यनुस्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
परि॑ ते॒ धन्व॑नो हे॒तिर॒स्मान् वृ॑णक्तु वि॒श्वतः॑। अथो॒ यऽइ॑षु॒धिस्तवा॒रेऽअ॒स्मन्निधे॑हि॒ तम्॥१२॥

परि॑। ते॒। धन्व॑नः। हे॒तिः। अ॒स्मान्। वृ॒ण॒क्तु॒। वि॒श्वतः॑। अथो॒ऽइत्यथो॑। यः। इ॒षु॒धिरिती॑षु॒ऽधिः। तव॑। आ॒रे। अ॒स्मत्। नि। धे॒हि॒। तम् ॥१२ ॥

Mantra without Swara
परि ते धन्वनो हेतिरस्मान्वृणक्तु विश्वतः । अथो यऽइषुधिस्तवारे अस्मन्निधेहि तम् ॥

परि। ते। धन्वनः। हेतिः। अस्मान्। वृणक्तु। विश्वतः। अथोऽइत्यथो। यः। इषुधिरितीषुऽधिः। तव। आरे। अस्मत्। नि। धेहि। तम्॥१२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे राजन् ! (ते) = तेरा (धन्वनः हेतिः) = धनुष-सम्बन्धी नाशक बाण (अस्मान्) = हमें विश्वतःसब ओर से (परिवृणक्तु) = शत्रु संकट से मुक्त करे [परिवर्जयतु - उ०], अर्थात् सब प्रान्तभाग इस प्रकार शस्त्र सन्नद्ध सेना से युक्त हों कि कोई भी शत्रु हमारे राष्ट्र पर आक्रमण न कर सके। राजा के ये शत्रु-शातक तीर हमें शत्रु-संकट से सदा सुरक्षित रक्खें। २. परन्तु हे राजन्! अथ (उ) = अब यह (यः) = जो तेरा (इषुधिः) = बाणों के रखने का तूणीर [तरकस] है (तम्) = उसे (अस्मत्) = हमसे आरे दूर ही (निधेहि) = रख, अर्थात् तेरे ये बाण अपनी प्रजा पर ही न चलने लगें।
Essence
भावार्थ - अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग शत्रुओं के शातन के लिए हो। अस्त्र-शस्त्रों को प्रजा से दूर ही रखना है।
Subject
धन्वनो हेतिः इषुधिः