Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 59

65 Mantra
15/59
Devata- इन्द्राग्नी देवते Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
लो॒कं पृ॑ण छि॒द्रं पृ॒णाथो॑ सीद ध्रु॒वा त्वम्। इ॒न्द्रा॒ग्नी त्वा॒ बृह॒स्पति॑र॒स्मिन् योना॑वसीषदन्॥५९॥

लो॒कम्। पृ॒ण॒। छि॒द्रम्। पृ॒ण॒। अथो॒ इत्यथो॑। सी॒द॒। ध्रु॒वा। त्वम्। इ॒न्द्रा॒ग्नी इती॑न्द्रा॒ग्नी। त्वा॒। बृह॒स्पतिः॑। अ॒स्मिन्। योनौ॑। अ॒सी॒ष॒द॒न्। अ॒सी॒स॒द॒न्नित्य॑सीसदन् ॥५९ ॥

Mantra without Swara
लोकम्पृण छिद्रम्पृणाथो सीद धु्रवा त्वम् । इन्द्राग्नी त्वा बृहस्पतिरस्मिन्योनावसीषदन् ॥

लोकम्। पृण। छिद्रम्। पृण। अथो इत्यथो। सीद। ध्रुवा। त्वम्। इन्द्राग्नी इतीन्द्राग्नी। त्वा। बृहस्पतिः। अस्मिन्। योनौ। असीषदन्। असीसदन्नित्यसीसदन्॥५९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पत्नी के लिए कहते हैं कि तू (लोकं पृण) = प्रकाश को [लोकं = आलोकं] (पृण) = [पिपूर्धि - म० ] भरनेवाली हो और इस प्रकार सबको [लोकं] सुखी कर [पृण] । २. (छिद्रं पृण) = घर के दोषों को फिर से ठीक कर देनेवाली हो, छिद्र को भर दे, दोषों को दूर कर दे । ३. (अथ उ) = और अब प्रकाश को भरने व दोषों को दूर करने के साथ (त्वम् ध्रुवा सीद) = तू ध्रुव होकर यहाँ घर में रह । ४. (इन्द्राग्नी) = इन्द्र और अग्नि तथा (बृहस्पतिः) = ज्ञान का स्वामी (त्वा) = तुझे (अस्मिन् योनौ) = इस घर में (असीषदन्) = स्थापित करें-बिठाएँ, अर्थात् तेरे पति की तीन विशेषताएँ हों। [क] सर्वप्रथम वह 'इन्द्र' हो, जितेन्द्रिय हो। पति का असंयत जीवन पत्नी के जीवन पर एक ऐसा अशुभ प्रभाव उत्पन्न करेगा कि वह घर में ध्रुव होकर कभी न रह सकेगी। [ख] पति 'अग्नि' हो, उसके अन्दर गरमी व उत्साह हो। ऐसा ही पति घर की उन्नति का कारण बन सकता है और वही पत्नी के जीवन में उत्साह उत्पन्न करके उसे घर की उन्नति के कार्यों में व्यापृत रखनेवाला होता है। [ग] पति 'बृहस्पति हो, यह ऊँचे-से-ऊँचे ज्ञान का पति हो। ऐसा ही पति पत्नी से उचित आदर पा सकता है और पत्नी के हृदय में अपने लिए स्थान बना सकता है। इस पति के साथ ही पत्नी अपने सम्बन्ध का ध्यान करती हुई अपने को गौरवान्वित अनुभव करती है। असंयमी, उत्साहशून्य, मूर्ख पति पत्नी की स्थिरता का कारण नहीं बन सकता। 'इन्द्र' बनकर यह शरीर को सुन्दर बनाता है, 'अग्नि' बनकर मन को शक्तिशाली बनाता है, बृहस्पति बनकर यह मस्तिष्क को ज्ञानोज्ज्वल करता है। यही परमेष्ठी बनना है।
Essence
भावार्थ- पत्नी घर में अपने सौन्दर्य व ज्ञान से प्रकाश भर दे, दोषों को दूर करनेवाली हो, स्थिर वृत्तिवाली हो। पति 'जितेन्द्रिय, उत्साही तथा उत्कृष्ट ज्ञान सम्पन्न' हो। ऐसा ही पति 'परमेष्ठी' कहला सकता है।
Subject
इन्द्र, अग्नि व बृहस्पति