Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 55

65 Mantra
15/55
Devata- अग्निर्देवता Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
येन॒ वह॑सि स॒हस्रं॒ येना॑ग्ने सर्ववेद॒सम्। तेने॒मं य॒ज्ञं नो॑ नय॒ स्वर्दे॒वेषु॒ गन्त॑वे॥५५॥

येन॑। वह॑सि। स॒हस्र॑म्। येन॑। अ॒ग्ने॒। स॒र्व॒वे॒द॒समिति॑ सर्वऽवे॒द॒सम्। तेन॑। इ॒मम्। य॒ज्ञम्। नः॒। न॒य॒। स्वः᳖। दे॒वेषु॑। गन्त॑वे ॥५५ ॥

Mantra without Swara
येन वहसि सहस्रँयेनाग्ने सर्ववेदसम् तेनेमँयज्ञन्नो नय स्वर्देवेषु गन्तवे ॥

येन। वहसि। सहस्रम्। येन। अग्ने। सर्ववेदसमिति सर्वऽवेदसम्। तेन। इमम्। यज्ञम्। नः। नय। स्वः। देवेषु। गन्तवे॥५५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (अग्ने) = यज्ञाग्ने! तू (येन) = अपने जिस सामर्थ्य से हमारे दिये हुए घृतादि पदार्थों को (सहस्त्रं वहसि) = सहस्रगुणा करके प्राप्त कराता है और येन = अपने जिस सामर्थ्य से तू (सर्ववेदसम्) = सम्पूर्ण धनों को वहसि प्राप्त कराता है। स्वास्थ्य व सौमनस्य के साथ उत्तम अन्नादि को प्राप्त कराता हुआ यह अग्नि हमें सब धनों को प्राप्त करने के योग्य करता है। २. (तेन) = अपने उसी 'सहस्र वहन' व 'सर्ववेदस् वहन' के सामर्थ्य से (नः इमं यज्ञम्) = हमारे इस यज्ञ को - यज्ञ में डाले गये पदार्थों को (स्वः) = आदित्य तक नय-ले-जा, जिससे (देवेषु गन्तवे) = ये पदार्थ देवों में जानेवाले हों, वायु आदि सारे देवों को प्राप्त हों। ये वायु आदि का मानो भोजन ही बन जाए। ३. मनु के अनुसार- ('अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते') = अग्नि में विधिवत् डाली हुई आहुति सूर्य तक पहुँचती है और इस प्रकार पृथिवी, अन्तरिक्ष व द्युलोक के सब देवों में पहुँच जाती है। देव मानो इस अग्निरूप मुख से इन घृतादि पदार्थों को खानेवाले बनते हैं। ४. पिछले मन्त्रभाग का अर्थ इस रूप में भी हो सकता है कि हे अग्ने ! क्योंकि तू दत्तहवि को सहस्रगुणा करके इन सम्पूर्ण धनों को ही हमें प्राप्त करानेवाला है (तेन) = अतः (नः देवेषु) = हमारे देववृत्तिवाले- समझदार पुरुषों में (इमं यज्ञं नय) = इस यज्ञ को प्राप्त करा, वे सब इस यज्ञ को करनेवाले हों, जिससे (स्वः गन्तवे) = सुखमय स्थिति में पहुँच सकें। 'स्वर्गकामो यजेत' = यज्ञ से स्वर्ग मिलता है, अतः इन यज्ञों से हमारे घर स्वर्ग बन जाएँ। ५. ('येन वहसि सहस्त्रम्') = इस मन्त्रभाग के भाव से ही कालिदास ने 'सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः' ये शब्द लिखे हैं कि सूर्य जल को लेता है पर सहस्रगुणित-सा करके उसे फिर इस भूमि पर बरसा देता है। इसी प्रकार यह यज्ञाग्नि भी हमारे घृतादि पदार्थों को लेती है और सहस्रगुणित करके हमें लौटा देती है। सारे वायुमण्डल को शुद्ध करके और हमें स्वास्थ्य व सौमनस्य देकर यह सम्पूर्ण धनों का कारण बनती है।
Essence
भावार्थ-यज्ञाग्नि में डाले गये पदार्थ सहस्रगुणित होकर हमें फिर प्राप्त हो जाते हैं। ये हमारी सुखमय स्थिति का कारण हैं।
Subject
देवेषु गन्तवे सहस्त्रं सर्ववेदसम्