Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 51

65 Mantra
15/51
Devata- अग्निर्देवता Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- स्वराडार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ वा॒चो मध्य॑मरुहद् भुर॒ण्युर॒यम॒ग्निः सत्प॑ति॒श्चेकि॑तानः। पृ॒ष्ठे पृ॑थि॒व्या निहि॑तो॒ दवि॑द्युतदधस्प॒दं कृ॑णुतां॒ ये पृ॑त॒न्यवः॑॥५१॥

आ। वा॒चः। मध्य॑म्। अ॒रु॒ह॒त्। भु॒र॒ण्युः। अ॒यम्। अ॒ग्निः। सत्प॑ति॒रिति॒ सत्ऽप॑तिः। चेकि॑तानः। पृ॒ष्ठे। पृ॒थि॒व्याः। निहि॑त॒ इति॒ निऽहि॑तः। दवि॑द्युतत्। अ॒ध॒स्प॒दम्। अ॒धः॒प॒दमित्य॑धःऽप॒दम्। कृ॒णु॒ता॒म्। ये। पृ॒त॒न्यवः॑ ॥५१ ॥

Mantra without Swara
आ वाचो मध्यमरुहद्गुरण्युरयमग्निः सत्पतिश्चेकितानः । पृष्ठे पृथिव्या निहितो दविद्युतदधस्पदङ्कृणुताँये पृतन्यवः ॥

आ। वाचः। मध्यम्। अरुहत्। भुरण्युः। अयम्। अग्निः। सत्पतिरिति सत्ऽपतिः। चेकितानः। पृष्ठे। पृथिव्याः। निहित इति निऽहितः। दविद्युतत्। अधस्पदम्। अधःपदमित्यधःऽपदम्। कृणुताम्। ये। पृतन्यवः॥५१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (अयं अग्निः) = यह प्रगतिशील विद्वान् [द०] (वाचः मध्यम् अरुहत्) = वाणी के मध्य में अपने आसन पर आरोहण करता है, अर्थात् अपने स्वाध्याय [Study] के कमरे में इसके चारों ओर वाङ्मय ही वाङ्मय होता है, बीच में यह बैठा होता है। यह ज्ञान का ही केन्द्र बनने का प्रयत्न करता है, ज्ञान में ही विचरण करता है। २. परन्तु (भुरण्युः) = यह भरणशील भी बनता है। अपने ज्ञान के रसास्वाद में यह इतना आसक्त नहीं हो जाता कि लोकहित करना ही भूल जाए। ३. सत्पति: अपने जीवन में 'सत्' की रक्षा करता है। यह 'उत्तम कर्मों को', 'उत्तम भावना' से तथा 'उत्तम प्रकार' से करनेवाला बनता है । ४. (चेकितानः) = यह सदा चेतनायुक्त होता है, संसार में समझदारी से चलता है । ५. (पृष्ठे पृथिव्याः निहित:) = यह पृथिवी के पृष्ठ पर स्थित होता है । (पृथिवी) = शरीरम् । शरीररूप रथ पर यह आरूढ़ होता है। इसका शरीर इसके वश में होता है, यह स्वस्थ होता है । ६. (दविद्युतत्) = ज्ञान की दीप्ति से यह अत्यन्त देदीप्यमान होता है। ७. और ये जो काम, क्रोध, लोभ आदि पाप-वृत्तियाँ (पृतन्यव:) = इसके साथ युद्ध की इच्छावाली होती हैं, अर्थात् इसपर आक्रमण करती हैं, उन्हें यह अधस्पदं (कृणुताम्) = पाँवों तले कुचल डाले ।
Essence
भावार्थ - अग्नि 'ज्ञानी बनता है, औरों के भरण का भी ध्यान करता है' सत्कर्मों का रक्षक व समझदार बनता है। यह शरीर को पूर्ण स्वस्थ करके ज्ञान-दीप्त होता है और वासनाओं को कुचल डालता है।
Subject
सत्पतिः, वाचः मध्यम्