Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 48

65 Mantra
15/48
Devata- अग्निर्देवता Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- स्वराड् ब्राह्मी बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अग्ने॒ त्वं नो॒ अन्त॑मऽउ॒त त्रा॒ता शि॒वो भ॑वा वरू॒थ्यः। वसु॑र॒ग्निर्वसु॑श्रवा॒ऽअच्छा॑ नक्षि द्यु॒मत्त॑मꣳ र॒यिं दाः॑। तं त्वा॑ शोचिष्ठ दीदिवः सु॒म्नाय॑ नू॒नमी॑महे॒ सखि॑भ्यः॥४८॥

अग्ने॑। त्वम्। नः॒। अन्त॑मः। उ॒त। त्रा॒ता। शि॒वः। भ॒व॒। व॒रू॒थ्यः᳖। वसुः॑। अ॒ग्निः। वसु॑श्रवा॒ इति॒ वसु॑ऽश्रवाः। अच्छ॑। न॒क्षि॒। द्यु॒मत्त॑म॒मिति॑ द्यु॒मत्ऽत॑मम्। र॒यिम्। दाः॒। तम्। त्वा॒। शो॒चि॒ष्ठ॒। दी॒दि॒व॒ इति॑ दीदिऽवः। सु॒म्नाय॑। नू॒नम्। ई॒म॒हे॒। सखि॑भ्य॒ इति॒ सखि॑ऽभ्यः ॥४८ ॥

Mantra without Swara
अग्ने त्वन्नोऽअन्तमऽउत त्राता शिवो भव वरूथ्यः । वसुरग्निर्वसुश्रवाऽअच्छा नक्षि द्युमत्तमँ रयिन्दाः तन्त्वा शोचिष्ठ दीदिवः सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्यः ॥

अग्ने। त्वम्। नः। अन्तमः। उत। त्राता। शिवः। भव। वरूथ्यः। वसुः। अग्निः। वसुश्रवा इति वसुऽश्रवाः। अच्छ। नक्षि। द्युमत्तममिति द्युमत्ऽतमम्। रयिम्। दाः। तम्। त्वा। शोचिष्ठ। दीदिव इति दीदिऽवः। सुम्नाय। नूनम्। ईमहे। सखिभ्य इति सखिऽभ्यः॥४८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र का अग्नि=प्रगतिशील जीव प्रभु से प्रार्थना करता है कि अग्ने हे अग्रेणी प्रभो! (त्वं नः अन्तमः) = आप ही हमारे अन्तिकतम मित्र हो। सभी साथ छोड़ जाएँ तो भी आप सदा साथ होते हो। मैं आपका मित्र बनूँ या न बनूँ आप तो मेरे मित्र हो ही। २. (उत) = और (त्राता) = आप ही रक्षक हो। उचित अन्नादि प्राप्त कराके आप ही मेरा त्राण करते हो । ३. (शिवः) = आप सदा मेरा कल्याण करते हो। ४. (वरूथ्यः) = आप मेरे उत्तम आच्छादन [cover] (भव) = हो । 'अमृतोपस्तरणं, अमृतापिधानम्' = आप अमृत उपस्तरण व अपिधान हो । आपको अपना आवरण पाकर ही तो मैं 'सत्य, यश व श्री' को प्राप्त किया करता हूँ। ५. (वसुः) = इस प्रकार आप मेरे निवास को उत्तम बनाते हो । वस्तुतः मैं आपमें ही निवास पाता हूँ। ६. (अग्निः) = आप सब प्रकार से मुझे आगे ले चलते हो। ७. आप (वसुश्रवाः) = निवास के लिए आवश्यक धनों के देनेवाले हो । [श्रवः = धन - नि० २।२०] आप ही निवास के लिए आवश्यक अन्नों को देते हो [श्रवः = अन्न- नि० १०।३] ८. (अच्छ) = आप सदा मेरी ओर आते हो, आते ही नहीं (नक्षि) = [knock at] मेरे द्वार को खटखटाते भी हो, मैं अभागा उस परन्तु ब्राह्ममुहूर्त में सोया ही रह जाता हूँ और आपके लिए द्वार को खोलता नहीं। बाइबल तो कहती है कि 'knock and it will be opened to you' पर वेद कहता है कि 'He knocks, be wise to open it. ' परमात्मा द्वार खटखटाता है, ज़रा जाग और खोल । ९. वे परमात्मा (द्युमत्तमं रयिन्दा:) = अधिक-से-अधिक ज्योतिर्मय धन देंगे। धन देंगे, साथ ही वे ज्ञान भी प्राप्त कराएँगे। १०. हे प्रभो! (तम्) = उस (त्वा) = आपको जो आप शोचिष्ठ अतिशयेन तेजस्वी हैं, (दीदिव:) = [ये दीदयन्ति ते दीदयाः प्रकाशास्ते बहवो विद्यन्ते यस्मिन् - द० ] = अतिशयेन ज्ञान की दीप्तिवाले हैं, उन आपको (नूनम्) = निश्चय से (सखिभ्यः) = सब मित्रों के लिए नकि केवल अपने (सुम्नाय) = सुख के लिए (ईमहे) = याचना करते हैं। सुख की प्रार्थना केवल अपने लिए नहीं करनी, घर में रहनेवाले पत्नी, पुत्री, भाई आदि सबके लिए यह प्रार्थना करनी है।
Essence
भावार्थ- वे प्रभु हमारे अत्यन्त समीप हैं। वे हमारी रक्षा करते हैं, हमारे घरों पर आते हैं और यदि हम द्वार खोलें तो ज्ञानयुक्त धन देते हैं।
Subject
अग्नि की अग्नि से प्रार्थना, He knocks