Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 45

65 Mantra
15/45
Devata- अग्निर्देवता Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- भुरिगार्षी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अधा॒ ह्यग्ने॒ क्रतो॑र्भ॒द्रस्य॒ दक्ष॑स्य सा॒धोः। र॒थीर्ऋ॒तस्य॑ बृह॒तो ब॒भूथ॑॥४५॥

अध॑। हि। अ॒ग्ने॒। क्रतोः॑। भ॒द्रस्य॑। दक्ष॑स्य। सा॒धोः। र॒थीः। ऋ॒तस्य॑। बृ॒ह॒तः। ब॒भूथ॑ ॥४५ ॥

Mantra without Swara
अधा ह्यग्ने क्रतोर्भद्रस्य दक्षस्य साधोः । रथीरृतस्य बृहतो बभूथ ॥

अध। हि। अग्ने। क्रतोः। भद्रस्य। दक्षस्य। साधोः। रथीः। ऋतस्य। बृहतः। बभूथ॥४५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (अग्ने) = हमारे जीवन के अग्रेणी प्रभो! आप (अद्य) = अब हमारे स्तवन के बाद (हि) = निश्चय से (भद्रस्य क्रतोः) = शुभ संकल्प, प्रज्ञान व यज्ञरूप कर्म के (रथी:) = सारथि के समान निर्वाहक होते हो। आप हमें शुभ संकल्प, प्रज्ञान व कर्म प्राप्त कराते हो। [क्रतु-संकल्प, प्रज्ञान, कर्म - नि० ३।५] । २. आप (दक्षस्य) = उस बल के [नि० २।५] भी प्राप्त करानेवाले हो जो बल (साधोः) = [साध्नोति] लोकरक्षा व परहित को सिद्ध करनेवाला होता है, आप हमें वह शक्ति देते हैं जो सदा उत्तम कार्यों की साधिका होती है और लोकरक्षण में विनियुक्त होती है। ३. आप उत्तम संकल्प व साधक शक्ति प्राप्त कराके (बृहतः) = सदा वृद्धि के कारणभूत (ऋतस्य) = यज्ञ के [नि० ८।२] और वस्तुतः सब ठीक कर्मों के (रथी:) = निर्वाहक (बभूथ) = होते हो।
Essence
भावार्थ - प्रभु हमें १. भद्र क्रतु उत्तम संकल्पवाला बनाते हैं । २. कार्यसाधक शक्ति प्राप्त कराते हैं। ३. संकल्प और शक्ति प्रदान कर हमारी वृद्धि के कारणभूत यज्ञों के निर्वाहक होते हैं।
Subject
संकल्प + बल+यज्ञ