Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 44

65 Mantra
15/44
Devata- अग्निर्देवता Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- आर्षी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अग्ने॒ तम॒द्याश्वं॒ न स्तोमैः॒ क्रतुं॒ न भ॒द्रꣳ हृ॑दि॒स्पृश॑म्। ऋ॒ध्यामा॑ त॒ऽओहैः॑॥४४॥

अग्ने॑। तम्। अ॒द्य। अश्व॑म्। न। स्तोमैः॑। क्रतु॑म्। न। भ॒द्रम्। हृ॒दि॒स्पृश॒मिति॑ हृदि॒ऽस्पृश॑म्। ऋ॒ध्याम॑। ते॒ ओहैः॑ ॥४४ ॥

Mantra without Swara
अग्ने तमद्याश्वन्न स्तोमैः क्रतुं न भद्रँ हृदिस्पृशम् । ऋध्यामा तऽओहैः ॥

अग्ने। तम्। अद्य। अश्वम्। न। स्तोमैः। क्रतुम्। न। भद्रम्। हृदिस्पृशमिति हृदिऽस्पृशम्। ऋध्याम। ते ओहैः॥४४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (अग्ने) = हमारी उन्नतियों के साधक प्रभो! (ते ओहै:) = [तव प्रापणैः] आपको प्राप्त करानेवाले (स्तोमैः) = स्तुतिसमूहों के साथ (अद्य) = आज हम (तम्) = उस-गत मन्त्र में वर्णित यज्ञ को (ऋध्याम्) = समृद्ध करें। २. उसी प्रकार समृद्ध करें (न) = जैसे [न- इव] (अश्वम्) = क्रियाओं में व्याप्त होनेवाली इन्द्रियों को । 'इन्द्रियाणि हयानाहु:'- हमारे इन्द्रियरूप अश्व खूब शक्तिशाली हों। ३. हम यज्ञ को उसी प्रकार समृद्ध करें (न) = जैसे (हृदिस्पृशम्) = [ हृदिस्पृशति इति] हृदय में जँच जानेवाले (भद्रम्) = शुभ (क्रतुम्) = संकल्प को। हमारे संकल्प शुभ तो हों ही, ऐसे शुभ हों कि सुननेवाले को भी जँचें, उसके हृदय पर उनका उत्तम प्रभाव हो। ४. एवं मन्त्रार्थ से यह स्पष्ट हैं कि [क] हम स्तुति करें, वह स्तुति जो हमारे जीवनों में एक विशिष्ट परिवर्तन लाकर हमें प्रभु को प्राप्त करानेवाली हो। [ख] इन स्तुतियों के साथ हम पिछले मन्त्र में वर्णित यज्ञ को सिद्ध करनेवाले हों। [ग] इन स्तुतियों व यज्ञों के द्वारा हम अपनी इन्द्रियों को उत्तम शक्ति सम्पन्न बनाएँ और [घ] साथ ही प्रभु-स्तवन व यज्ञों के कारण हमारे संकल्प भी सदा उत्तम हों, सुननेवाला भी उनकी प्रशंसा करे।
Essence
भावार्थ- हम स्तुति करें, यज्ञमय जीवनवाले हों, हमारी इन्द्रियाँ सशक्त हों, संकल्प उत्तम हों।
Subject
स्तुति+यज्ञ-शक्ति+उत्तम संकल्प