Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 43

65 Mantra
15/43
Devata- अग्निर्देवता Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- निचृत्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒भे सु॑श्चन्द्र स॒र्पिषो॒ दर्वी॑ श्रीणीषऽआ॒सनि॑। उ॒तो न॒ऽउत्पु॑पूर्या उ॒क्थेषु॑ शवसस्पत॒ऽइष॑ स्तो॒तृभ्य॒ऽआ भ॑र॥४३॥

उ॒भे इत्यु॒भे। सु॒श्च॒न्द्र॒। सु॒च॒न्द्रेति॑ सुऽचन्द्र। स॒र्पिषः॑। दर्वी॒ इति॒ दर्वी॑। श्री॒णी॒षे॒। आ॒सनि॑। उ॒तो इत्यु॒तो। नः॒। उत्। पु॒पू॒र्याः॒। उ॒क्थेषु॑। श॒व॒सः॒। प॒ते॒। इष॑म्। स्तो॒तृभ्य॒ इति॑ स्तो॒तृऽभ्यः॑। आ। भ॒र॒ ॥४३ ॥

Mantra without Swara
उभे सुश्चन्द्र सर्पिषो दर्वी श्रीणीषऽआसनि । उतो नऽउत्पुपूर्याऽउक्थेषु शवसस्पत इषँ स्तोतृभ्यऽआ भर ॥

उभे इत्युभे। सुश्चन्द्र। सुचन्द्रेति सुऽचन्द्र। सर्पिषः। दर्वी इति दर्वी। श्रीणीषे। आसनि। उतो इत्युतो। नः। उत्। पुपूर्याः। उक्थेषु। शवसः। पते। इषम्। स्तोतृभ्य इति स्तोतृऽभ्यः। आ। भर॥४३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (सुश्चन्द्र) = [शोभनं चन्दति आह्लादते आह्लादयति वा] उत्तम आनन्द को प्राप्त करने व करानेवाले स्तोतः ! तू (उभे) = दोनों सन्ध्याकालों में सर्पिषः दर्वी घृत की भरी कछियों को (आसनि) = अग्निकुण्ड में प्रज्वलित अग्नि के मुख में (श्रीणीषे) = [श्रयसि आश्लेषसि - उ०] आश्रित करता है, अर्थात् घृत से अग्निहोत्र करता है। २. इस प्रकार प्रात: सायं अग्निहोत्र करते हुए तू यही प्रार्थना करता है कि हे अग्ने ! (उत उ) = और अब तू भी (नः) = हमें (उत्पुपूर्या:) = [उत्कर्षेण अन्नादिभिः पूरय-म०] उत्कृष्ट अन्नादि से पूर्ण करनेवाला हो। 'देहि मे ददामि ते' - 'तू मुझे दे तो मैं भी तुझे देता हूँ,' इस अपनी प्रतिज्ञा को तू अब पूरा कर । वस्तुतः अग्निहोत्र में डाला हुआ घृतादि पदार्थ नष्ट न होकर सूक्ष्म कणों में विभक्त होकर सारे वायुमण्डल में व्याप्त हो जाता है। वह वृष्टि - बिन्दुओं का केन्द्र बनकर इस पृथिवी पर आता है और अन्न के एक-एक कण को पौष्टिक बना देता है । ३. (उक्थेषु) = स्तुतियों के होने पर स्तोताओं में (शवसस्पते) = बल की रक्षा करनेवाले प्रभो! आप (स्तोतृभ्यः) = स्तोताओं के लिए (इषम्) = प्रेरणा को (आभर) = प्राप्त कराइए।
Essence
भावार्थ - नियम से अग्निहोत्र करनेवाला व्यक्ति सदा आनन्दमय जीवनवाला व सौमनस्यवाला होता है। वह अग्निहोत्र से अपने अन्न भण्डारों को पूर्ण करता है और प्रभु-स्तवन से सशक्त बनता है।
Subject
अग्निहोत्र