Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 42

65 Mantra
15/42
Devata- अग्निर्देवता Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- आर्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
सोऽअ॒ग्निर्यो वसु॑र्गृ॒णे सं यमा॒य॑न्ति धे॒नवः॑। समर्व॑न्तो रघु॒द्रुवः॒ सꣳसु॑जा॒तासः॑ सू॒रय॒ऽइष॑ꣳ स्तो॒तृभ्य॒ऽआ भ॑र॥४२॥

सः। अ॒ग्निः। यः। वसुः॑। गृ॒णे। सम्। यम्। आ॒यन्तीत्या॒ऽयन्ति॑। धे॒नवः॑। सम्। अर्व॑न्तः। र॒घु॒द्रुव॒ इति॑ रघु॒ऽद्रुवः॑। सम्। सु॒जा॒तास॒ इति॑ सुऽजा॒तासः॑। सू॒रयः॑। इष॑म्। स्तो॒तृभ्य॒ इति॑ स्तो॒तृभ्यः॑। आ। भ॒र॒ ॥४२ ॥

Mantra without Swara
सोऽअग्निर्या वसुर्गृणे सँयमायन्ति धेनवः । समर्वन्तो रघुद्रुवः सँ सुजातासः सूरयऽइषँ स्तोतृभ्यऽआ भर ॥

सः। अग्निः। यः। वसुः। गृणे। सम्। यम्। आयन्तीत्याऽयन्ित। धेनवः। सम्। अर्वन्तः। रघुद्रुव इति रघुऽद्रुवः। सम्। सुजातास इति सुऽजातासः। सूरयः। इषम्। स्तोतृभ्य इति स्तोतृभ्यः। आ। भर॥४२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (सः अग्निः) = उन्नतिशील पुरुष वह है (यः) = जो (वसुः) = उत्तम निवासवाला है । २. (गृणे) [गृणाति] = जो नित्य प्रभु का स्तवन करता है। ३. (यम्) = जिसको (धेनवः) = दुधारू गौवें (समायन्ति) = सम्यक्तया प्राप्त होती हैं। ४. (रघुद्रुवः) = [लघुद्रवाणाः] शीघ्र गतिवाले (अर्वन्तः) = घोड़े (समायन्ति) = प्राप्त होते हैं, और जिसे ५. (सुजातासः) = शोभन जन्मवाले अथवा उत्तम विकासवाले (सूरयः) = विद्वान् लोग (समायन्ति) = प्राप्त होते हैं। ६. हे प्रभो! आप इन अग्नि बनानेवाले (स्तोतृभ्यः) = स्तोताओं के लिए (इषम्) = प्रेरणा (आभर) = प्राप्त कराइए, जिससे उस प्रेरणा के अनुसार चलते हुए ये सचमुच अग्नि बन सकें।
Essence
भावार्थ- उन्नतिशील व्यक्ति के लक्षण ये हैं। १. स्वस्थ बनता है, शरीर में उत्तम निवासवाला होता है। २. गौवों के दुग्ध का प्रयोग करता है। ३. विकासशील विद्वानों का सङ्ग करता है। ४. प्रभु-स्तवन के द्वारा प्रभु प्रेरणा को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।
Subject
अग्नि