Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 40

65 Mantra
15/40
Devata- अग्निर्देवता Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
येना॑ स॒मत्सु॑ सा॒सहोऽव॑ स्थि॒रा त॑नुहि॒ भूरि॒ शर्ध॑ताम्। व॒नेमा॑ तेऽअ॒भिष्टि॑भिः॥४०॥

येन॑। स॒मत्स्विति॑ स॒मत्ऽसु॑। सा॒सहः॑। स॒सह॒ इति॑ स॒सहः॑। अव॑। स्थि॒रा। त॒नु॒हि॒। भूरि॑। शर्ध॑ताम्। व॒नेम॑। ते॒। अ॒भिष्टि॑भि॒रित्य॒भिष्टि॑ऽभिः ॥४० ॥

Mantra without Swara
येना समत्सु सासहो व स्थिरा तनुहि भूरि शर्धताम् । वनेमा तेऽअभिष्टिभिः ॥

येन। समत्स्विति समत्ऽसु। सासहः। ससह इति ससहः। अव। स्थिरा। तनुहि। भूरि। शर्धताम्। वनेम। ते। अभिष्टिभिरित्यभिष्टिऽभिः॥४०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे प्रभो! हमें गत मन्त्र में वर्णित वह 'भद्र मन' दीजिए (येन) = जिससे (समत्सु) = संग्रामों में (सासहः) = शत्रुओं का पराभव कर सकें। २. आप कृपा करके (भूरि शर्धताम्) = नाना प्रकार से प्रभूत बल प्राप्त कराते हुए [अभिबलायमानानाम् - उ०] इन काम, क्रोध व लोभादि के स्थिरा - स्थिर धनुषों को (अवतनुहि) = ज्या [डोरी] -रहित कर दीजिए, अर्थात् इनकी शक्ति को क्षीण कर दीजिए। इस पञ्चबाण (काम) के बाण मुझपर चल ही न सकें, इस प्रकार इसके धनुष को ढीला कर दीजिए। ३. हे प्रभो! (ते अभिष्टिभिः) = तेरे द्वारा इन कामादि पर किये गये आक्रमणों से (वनेम) = हम विजयी बनें [वन्= win] अथवा (अभिष्टिभिः) = अभीष्ट यागों के द्वारा ते वनेम तेरा सम्भजन करें। यज्ञों के द्वारा हम आपका उपासन करें और 'त्वया स्विद् युजा वयम्' आपको अपना साथी पाकर हम इन क्रोधादि का पराजय करने में समर्थ हों ।
Essence
भावार्थ- हे प्रभो! आपकी कृपा से अत्यन्त प्रबल भी इन काम, क्रोध आदि को हम जीतनेवाले बनें। इन अभिबलायमान कामादि के अस्त्र शिथिल हो जाएँ और हम इन्हें पराजित कर सकें।
Subject
विजय