Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 20

65 Mantra
15/20
Devata- अग्निर्देवता Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- निचृदगायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्मू॒र्द्धा दि॒वः क॒कुत्पतिः॑ पृथि॒व्याऽअ॒यम्। अ॒पा रेता॑सि जिन्वति॥२०॥

अ॒ग्निः। मू॒र्द्धा। दि॒वः। क॒कुत्ऽपतिः॑। पृ॒थि॒व्याः। अ॒यम्। अ॒पाम्। रेता॑सि। जि॒न्व॒ति॒ ॥२० ॥

Mantra without Swara
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपाँ रेताँसि जिन्वति ॥

अग्निः। मूर्द्धा। दिवः। ककुत्ऽपतिः। पृथिव्याः। अयम्। अपाम्। रेतासि। जिन्वति॥२०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में वर्णित राजा (अग्निः) = अग्रेणी बनता है। यह स्वयं उन्नति करते हुए सारे राष्ट्र को आगे ले चलता है। २. (मूर्धा:) = यह राष्ट्र का मूर्धा बनता है, मस्तिष्क से जैसे सारे शरीर की सारी क्रियाओं की व्यवस्था होती है, उसी प्रकार यह राष्ट्र की सब क्रियाओं का व्यवस्थापन करता है । ३. (अयम्) = यह (दिवः) = प्रकाश का मस्तिष्क में ज्ञान को परिपूर्ण = करने का तथा (पृथिव्याः) = शारीरिक स्वास्थ्य का (ककुत् पतिः) = चोटी का रक्षक-रक्षक शिरोमणि बनता है। यह इस बात का ध्यान करता है कि राष्ट्र में कोई व्यक्ति अनपढ़ न रह जाए तथा यह भी व्यवस्था करने का प्रयत्न करता है कि सबके शरीर स्वस्थ हों । संक्षेप में, यह शिक्षा विभाग व स्वास्थ्य विभाग को सर्वाधिक महत्त्व देता है, अधिक-से-अधिक विद्यालयों की स्थापना तथा सफ़ाई का ध्यान करके यह लोगों के मस्तिष्क व शरीर दोनों को स्वस्थ बनाने के लिए यत्नशील होता है। ४. यह (अपाम्) = प्रजाओं के [आपो नारा इति प्रोक्ता:] (रेतांसि) = शक्तियों को (जिन्वति) = प्रीणित करता है। उनके जीवन में स्वास्थ्य व संयम के महत्त्व को बढ़ाकर यह उन्हें शक्ति सम्पन्न बनाता है।
Essence
भावार्थ - १. राजा को राष्ट्र का अग्रणी बनना है । २. यह राष्ट्र- शरीर का मस्तिष्क बने । ३. प्रजाओं के ज्ञान व स्वास्थ्य का ध्यान करे। ४. प्रजाओं को शक्ति सम्पन्न बनाये ।
Subject
ककुत्पतिः - सर्वोच्च रक्षक