Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 16

65 Mantra
15/16
Devata- ग्रीष्मर्तुर्देवता Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- निचृत् प्रकृतिः Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒यं द॑क्षि॒णा वि॒श्वक॑र्मा॒ तस्य॑ रथस्व॒नश्च॒ रथे॑चित्रश्च सेनानीग्राम॒ण्यौ। मे॒न॒का च॑ सहज॒न्या चा॑प्स॒रसौ॑ यातु॒धाना॑ हे॒ती रक्षा॑सि॒ प्रहे॑ति॒स्तेभ्यो॒ नमो॑ऽअस्तु॒ ते नो॑ऽवन्तु॒ ते नो॑ मृडयन्तु॒ ते यं द्वि॒ष्मो यश्च॑ नो॒ द्वेष्टि॒ तमे॑षां॒ जम्भे॑ दध्मः॥१६

अ॒यम्। द॒क्षि॒णा। वि॒श्वक॒र्मेति॑ वि॒श्वऽक॑र्मा। तस्य॑। र॒थ॒स्व॒न इति॑ रथऽस्व॒नः। च॒। रथे॑चित्र॒ इति॒ रथे॑ऽचित्रः। च॒। से॒ना॒नी॒ग्रा॒म॒ण्यौ। से॒ना॒नी॒ग्रा॒म॒न्याविति॑ सेनानीग्राम॒न्यौ। मे॒न॒का। च॒। स॒ह॒ज॒न्येति॑ सहऽज॒न्या। च॒। अ॒प्स॒रसौ॑। या॒तु॒धाना॒ इति॑ यातु॒ऽधानाः॑। हे॒तिः। रक्षा॑सि। प्रहे॑ति॒रिति॒ प्रऽहे॑तिः। तेभ्यः॑। नमः॑। अ॒स्तु॒। ते। नः॒। अ॒व॒न्तु॒। ते। नः॒। मृ॒ड॒य॒न्तु॒। ते। यम्। द्वि॒ष्मः। यः। च॒। नः॒। द्वेष्टि॑। तम्। ए॒षा॒म्। जम्भे॑। द॒ध्मः॒ ॥१६ ॥

Mantra without Swara
अयन्दक्षिणा विश्वकर्मा तस्य रथस्वनश्च रथेचित्रश्च सेनानीग्रामण्या । मेनका च सहजन्या चाप्सरसौ यातुधाना हेती रक्षाँसि प्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नो वन्तु ते नो मृडयन्तु ते यन्द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषाञ्जम्भे दध्मः ॥

अयम्। दक्षिणा। विश्वकर्मेति विश्वऽकर्मा। तस्य। रथस्वन इति रथऽस्वनः। च। रथेचित्र इति रथेऽचित्रः। च। सेनानीग्रामण्यौ। सेनानीग्रामन्याविति सेनानीग्रामन्यौ। मेनका। च। सहजन्येति सहऽजन्या। च। अप्सरसौ। यातुधाना इति यातुऽधानाः। हेतिः। रक्षासि। प्रहेतिरिति प्रऽहेतिः। तेभ्यः। नमः। अस्तु। ते। नः। अवन्तु। ते। नः। मृडयन्तु। ते। यम्। द्विष्मः। यः। च। नः। द्वेष्टि। तम्। एषाम्। जम्भे। दध्मः॥१६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (अयं दक्षिणा) = यह राजा दक्षिणा दिग् का अधिपति है, अर्थात् दाक्षिण्य कानैपुण्य का - अधिपति है। २. दाक्षिण्य का अधिपति होता हुआ यह विश्वकर्मा - 'विश्वस्मिन् करोति' सदा कार्यों का करनेवाला है, 'अयं वै वायु विश्वकर्मा० श० ८१६ | १|१७' वायु की भाँति सदा क्रियाशील है। ३. (तस्य) = उस राजा का (रथस्वनः) = [रथे स्थितः स्वनति] युद्ध - रथ पर आरुढ़ होकर शत्रुओं को ललकारनेवाला (सेनानी:) = सेनापति है तथा (रथेचित्र:) = [रथे स्थितः आश्चर्यकारी] सदा रथारूढ़ होकर आश्चर्यजनक शक्ति से निरन्तर कार्यों को करनेवाला एक (ग्रामणी:) = ग्रामनायक है । ग्रैष्मौ तौ ऋतू - श० ८ ६ । १ । १७ । - ये सदा सोत्साह हैं और बड़ी व्यवस्थित गतिवाले हैं। ४. शत्रु पराजय के द्वारा मान पानेवाला 'मेनका' [मानयन्ति एनाम्]=सम्मानित सेनानी (अप्सरसौ) = अफ़्सर है तथा ग्रामणी रूप अफ़सर (सहजन्या) = लोगों के अन्दर मिलकर कार्यों को विकास करने की भावना को जन्म देनेवाला है। आजकल के को ऑपरेटिव सिस्टम तथा कम्युनिटी प्रोजेक्ट्स इस 'सहजन्या' शब्द से संकेतित हो रहे हैं । ५. सेनानी दृष्टिकोण से (यातुधानाः) = शत्रुओं में पीड़ा का आधान करनेवाले - प्रतिक्षण उनकी सिरदर्दी का कारण बननेवाले सैनिक (हेतिः) = वज्र हैं- राष्ट्र की बाह्य आक्रमणों से रक्षा के साधन हैं और ग्रामणी के दृष्टिकोण से रक्षांसि [रक्षू resque] रक्षा के लिए नियत चौकीदार व पुलिस के व्यक्ति (प्रहेतिः) = प्रकृष्ट वज्र हैं। ये सदा राष्ट्र को अन्दर की अव्यवस्था से बचाते हैं । ६. (तेभ्य:) = इस वायु सदृश राजा, उन सेनानी, ग्रामणी, अप्सरस् व हेति और प्रहेति सबके लिए (नमः अस्तु) = हमारा नमस्कार हो। (ते नः अवन्तु) = वे हमारी रक्षा करें। (ते नो मृडयन्तु) = वे हमारे जीवन को सुखी बनाएँ । (ते) = वे (यं द्विष्मः) = अवाञ्छनीय होने से जिसके प्रति हम सब प्रेम नहीं कर पाते (यः च नः द्वेष्टि) = जो हम सबके साथ द्वेष करता है (तम्) = उसको (एषाम्) = इन राजा व उसके अफ़सरों के (जभ्मे) = दंष्ट्राकराल न्यायरूप जबड़े में (दध्मः) = स्थापित करते हैं।
Essence
भावार्थ - राजा वायु की भाँति नैसर्गिकी क्रियावाला है-आलस्य से दूर है। इसके सेनानी शत्रु - पराजय द्वारा राष्ट्र का मान बढ़ाते हैं और ग्रामणी लोगों में मिलकर कार्य करने के द्वारा विकास की भावना को दृढ़-मूल करते हैं।
Subject
विश्वकर्मा