Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 12

65 Mantra
15/12
Devata- आदित्या देवताः Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- निचृद्ब्रह्मी जगती, ब्रह्मी बृहती Swara- निषादः, मध्यमः
Mantra with Swara
स॒म्राड॑सि प्र॒तीची॒ दिगा॑दि॒त्यास्ते॑ दे॒वाऽअधि॑पतयो॒ वरु॑णो हेती॒नां प्र॑तिध॒र्त्ता स॑प्तद॒शस्त्वा॒ स्तोमः॑ पृथि॒व्याश्र॑यतु मरुत्व॒तीय॑मु॒क्थमव्य॑थायै स्तभ्नातु वैरू॒पꣳ साम॒ प्रति॑ष्ठित्याऽअ॒न्तरि॑क्ष॒ऽऋष॑यस्त्वा प्रथम॒जा दे॒वेषु॑ दि॒वो मात्र॑या वरि॒म्णा प्र॑थन्तु विध॒र्त्ता चा॒यमधि॑पतिश्च॒ ते त्वा॒ सर्वे॑ संविदा॒ना नाक॑स्य पृ॒ष्ठे स्व॒र्गे लो॒के यज॑मानं च सादयन्तु॥१२॥

स॒म्राडिति॑ स॒म्ऽराट्। अ॒सि॒। प्र॒तीची॑। दिक्। आ॒दि॒त्याः। ते॒। दे॒वाः। अधि॑पतय॒ इत्यधि॑ऽपतयः। वरु॑णः। हे॒ती॒नाम्। प्र॒ति॒ध॒र्त्तेति॑ प्रतिऽध॒र्त्ता। स॒प्त॒द॒श इति॑ सप्तऽद॒शः। त्वा॒। स्तोमः॑। पृ॒थि॒व्याम्। श्र॒य॒तु॒। म॒रु॒त्व॒तीय॑म्। उ॒क्थम्। अव्य॑थायै। स्त॒भ्ना॒तु॒। वै॒रू॒पम्। साम॑। प्रति॑ष्ठित्यै। प्रति॑स्थित्या॒ इति॒ प्रति॑ऽस्थित्यै। अ॒न्तरि॑क्षे। ऋष॑यः। त्वा॒। प्र॒थ॒म॒जा इति॑ प्रथम॒ऽजाः। दे॒वेषु॑। दि॒वः। मात्र॑या। व॒रि॒म्णा। प्र॒थ॒न्तु॒। वि॒ध॒र्त्तेति॑ विऽध॒र्त्ता। च॒। अ॒यम्। अधि॑पति॒रित्यधि॑ऽपतिः। च॒। ते। त्वा॒। सर्वे॑। सं॒वि॒दा॒ना इति॑ सम्ऽविदा॒नाः। नाक॑स्य। पृ॒ष्ठे। स्व॒र्ग इति॑ स्वः॒ऽगे। लो॒के। यज॑मानम्। च॒। सा॒द॒य॒न्तु॒ ॥१२ ॥

Mantra without Swara
सम्राडसि प्रतीची दिगादित्यास्ते देवाऽअधिपतयो वरुणो हेतीनाम्प्रतिधर्ता सप्तदशस्त्वा स्तोमः पृथिव्याँ श्रयतु मरुत्वतीयमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु वैरूपँ साम प्रतिष्ठित्याऽअन्तरिक्षऽऋषयस्त्वा प्रथमजा देवेषु दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथन्तु विधर्ता चायमधिपतिश्च ते त्वा सर्वे सँविदाता नाकस्य पृष्ठे स्वर्गे लोके यजमानञ्च सादयन्तु ॥

सम्राडिति सम्ऽराट्। असि। प्रतीची। दिक्। आदित्याः। ते। देवाः। अधिपतय इत्यधिऽपतयः। वरुणः। हेतीनाम्। प्रतिधर्त्तेति प्रतिऽधर्त्ता। सप्तदश इति सप्तऽदशः। त्वा। स्तोमः। पृथिव्याम्। श्रयतु। मरुत्वतीयम्। उक्थम्। अव्यथायै। स्तभ्नातु। वैरूपम्। साम। प्रतिष्ठित्यै। प्रतिस्थित्या इति प्रतिऽस्थित्यै। अन्तरिक्षे। ऋषयः। त्वा। प्रथमजा इति प्रथमऽजाः। देवेषु। दिवः। मात्रया। वरिम्णा। प्रथन्तु। विधर्त्तेति विऽधर्त्ता। च। अयम्। अधिपतिरित्यधिऽपतिः। च। ते। त्वा। सर्वे। संविदाना इति सम्ऽविदानाः। नाकस्य। पृष्ठे। स्वर्ग इति स्वःऽगे। लोके। यजमानम्। च। सादयन्तु॥१२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (सम्राट् असि) = तू घर में उत्तमता से शासन करनेवाली है। २. (प्रतीची दिक्) = प्रतीची तेरी दिशा है। यह तुझे [प्रति अञ्च्] वापस लौटने का उपदेश दे रही है। दाक्षिण्य से ऐश्वर्य के बढ़ने पर इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हो जाने की बड़ी आशंका है, अतः तूने इन्द्रियों को विषयों से वापस लौटाने का ध्यान करना है, यही 'प्रत्याहार' है । ३. (आदित्याः ते देवा:) = आदित्य तेरे देव हैं। इनकी आराधना से तू इनकी भाँति ही उत्तमता का आदान करनेवाली हो। इस उत्तमता का निरन्तर आदान (अधिपतयः) = तेरा आधिक्येन रक्षक हो । ४. (वरुणः) = सब प्रकार के द्वेषों का निवारण करनेवाला गृहपति (हेतीनाम्) = घर पर पड़नेवाले वज्रों व कष्टों का (प्रतिधर्त्ता) = प्रतीकार करनेवाला हो। वस्तुतः यह निर्देषता ही घर के कल्याण का साधन हो जाए। ५. (सप्तदश स्तोमः) = पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण तथा मन और बुद्धि का समूह (त्वा) = तुझे (पृथिव्याम्) = इस शरीर में सेवन करनेवाला हो । इनके द्वारा तेरा शरीर बड़ा ठीक बना रहे। ६. (मरुत्वतीय उक्थम्) = प्रशंसनीय मितभाषण [ मरुतः मितराविण:, मरुत्वतीय - मरुतोंवाली मितभाषिता] (अव्यथायै) = पीड़ा न होने देने के लिए (स्तभ्नातु) = तुझे थामे, अर्थात् मितभाषण तेरी पीड़ा के अभाव का कारण बने । ७. (वैरूपं साम) = 'मुझे विशिष्ट रूपवाला बनना है' इस निश्चय - सम्बन्धी उपासना (अन्तरिक्षे) = हृदयाकाश में (प्रतिष्ठित्यै) = प्रतिष्ठा के लिए हो। तेरे हृदय में यह मूलभूत सिद्धान्त अंकित हो जाए कि 'इस मानव जीवन में मुझे विशिष्ट रूपवाला बनना है।' ८. (त्वा) = तुझे (देवेषु) = विद्वानों में (प्रथमजा:) = प्रथम कोटि में होनेवाले (ऋषयः) = तत्त्वद्रष्टा लोग (दिवः मात्रया) = ज्ञान के अंश से तथा (वरिम्णा) = हृदय के विस्तार से प्रथन्तु प्रसिद्ध करें, तेरे जीवन की शक्तियों का विस्तार करें। ९. (विधर्त्ता) = सब द्वेषों के निवारण से आपत्तियों का प्रतीकार करनेवाला यह 'वरुण', (च अयं अधिपतिः) = और अधिष्ठातृरूपेण रक्षक ये आदित्य देव, (ते सर्वे च) = और वे सब प्रथमज ऋषि - उत्कृष्ट श्रेणी के ज्ञानी लोग (संविदाना:) = ऐकमत्यवाले होकर (नाकस्य पृष्ठे) = दुःखाभाववाले लोक के ऊपर (स्वर्गे लोके) = सुखमय लोक में (त्वा) = तुझे और (यजमानम्) = यज्ञशील गृहपति को (सादयन्तु) = बिठाएँ। इन सबकी कृपा से गृह स्वर्ग बन जाए।
Essence
भावार्थ- पत्नी घर में उत्तमता से शासन करनेवाली हो। अच्छाइयों के ग्रहण के स्वभाववाली, मितभाषिणी, विशिष्ट रूपता को ध्येय बनाकर चलनेवाली हो। पति सब प्रकार के द्वेष का निवारण करनेवाला हो। ये बातें घर को अवश्य स्वर्ग बनाएँगी।
Subject
सम्राट्