Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 10

65 Mantra
15/10
Devata- वसवो देवताः Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- विराड् ब्राह्मी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
राज्ञ्य॑सि॒ प्राची॒ दिग्वस॑वस्ते दे॒वाऽअधि॑पतयो॒ऽग्निर्हे॑ती॒नां प्र॑तिध॒र्त्ता त्रि॒वृत् त्वा॒ स्तोमः॑ पृथि॒व्याश्र॑य॒त्वाज्य॑मु॒क्थमव्य॑थायै स्तभ्नातु रथन्त॒रꣳसाम॒ प्रति॑ष्ठित्याऽअ॒न्तरि॑क्ष॒ऽऋष॑यस्त्वा प्रथम॒जा दे॒वेषु॑ दि॒वो मात्र॑या वरि॒म्णा प्र॑थन्तु विध॒र्त्ता चा॒यमधि॑पतिश्च॒ ते त्वा॒ सर्वे॑ संविदा॒ना नाक॑स्य पृ॒ष्ठे स्व॒र्गे लो॒के यज॑मानं च सादयन्तु॥१०॥

राज्ञी॑। अ॒सि॒। प्राची॑। दिक्। वस॑वः। ते॒। दे॒वाः। अधि॑पत॒य इत्यधि॑ऽपतयः। अ॒ग्निः। हे॒ती॒नाम्। प्र॒ति॒ध॒र्त्तेति॑ प्रतिऽध॒र्त्ता। त्रि॒वृदिति॑ त्रि॒ऽवृत्। त्वा॒। स्तोमः॑। पृ॒थि॒व्याम्। श्र॒य॒तु॒। आज्य॑म्। उ॒क्थम्। अव्य॑थायै। स्त॒भ्ना॒तु॒। र॒थ॒न्त॒रमिति॑ रथम्ऽत॒रम्। साम॑। प्रति॑ष्ठित्यै। प्रति॑स्थित्या॒ इति॒ प्रति॑ऽस्थित्यै। अ॒न्तरि॑क्षे। ऋष॑यः। त्वा॒। प्र॒थ॒म॒जा इति॑ प्रथम॒ऽजाः। दे॒वेषु॑। दि॒वः। मात्र॑या। व॒रि॒म्णा। प्र॒थ॒न्तु॒। वि॒ध॒र्त्तेति॑ विऽध॒र्त्ता। च॒। अ॒यम्। अधि॑पति॒रित्यधि॑ऽपतिः। च॒। ते। त्वा॒। सर्वे॑। सं॒वि॒दा॒ना इति॑ सम्ऽवि॒दा॒नाः। नाक॑स्य। पृ॒ष्ठे। स्व॒र्ग इति॑ स्वः॒ऽगे। लो॒के। यज॑मानम्। च॒। सा॒द॒य॒न्तु॒ ॥१० ॥

Mantra without Swara
राज्ञ्यसि प्राची दिग्वसवस्ते देवाऽअधिपतयोग्निर्हेतीनाम्प्रतिधर्ता त्रिवृत्त्वा स्तोमः पृथिव्याँ श्रयत्वाज्यमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु रथन्तरँ साम प्रतिष्ठत्याऽअन्तरिक्षऽऋषयस्त्वा प्रथमजा देवेषु दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथन्तु विधर्ता चायमधिपतिश्च ते त्वा सर्वे सँविदाता नाकस्य पृष्ठे स्वर्गे लोके यजमानञ्च सादयन्तु ॥

राज्ञी। असि। प्राची। दिक्। वसवः। ते। देवाः। अधिपतय इत्यधिऽपतयः। अग्निः। हेतीनाम्। प्रतिधर्त्तेति प्रतिऽधर्त्ता। त्रिवृदिति त्रिऽवृत्। त्वा। स्तोमः। पृथिव्याम्। श्रयतु। आज्यम्। उक्थम्। अव्यथायै। स्तभ्नातु। रथन्तरमिति रथम्ऽतरम्। साम। प्रतिष्ठित्यै। प्रतिस्थित्या इति प्रतिऽस्थित्यै। अन्तरिक्षे। ऋषयः। त्वा। प्रथमजा इति प्रथमऽजाः। देवेषु। दिवः। मात्रया। वरिम्णा। प्रथन्तु। विधर्त्तेति विऽधर्त्ता। च। अयम्। अधिपतिरित्यधिऽपतिः। च। ते। त्वा। सर्वे। संविदाना इति सम्ऽविदानाः। नाकस्य। पृष्ठे। स्वर्ग इति स्वःऽगे। लोके। यजमानम्। च। सादयन्तु॥१०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे गृहपत्त्रि! तू (राज्ञी असि) = [राज्= दीप्तौ, to regulate, to direct ] तू अपने व्यवहार से दीप्त होनेवाली है। तेरा जीवन बड़ा व्यवस्थित है, इसी से तो तू सारे घर को व्यवस्थित करनेवाली है। २. (प्राची दिक्) = प्राची तेरी दिशा है। यह दिशा तुझे तेरे मार्ग का संकेत करनेवाली है। [ प्र अञ्च] यह तुझे निरन्तर आगे बढ़ने का निर्देश कर रही है। ३. (वसवः ते देवाः) = वसु तेरे आराध्य देव हैं, शरीर के पूर्ण स्वास्थ्य के लिए तू निवासक तत्त्वों का ध्यान करनेवाली है। वे देव ही तेरे (अधिपतयः) = आधिक्येन रक्षा करनेवाले हैं । ४. (अग्निः) = उन्नतिशील, अग्रेणी यह तेरा पति (हेतीनाम्) = घर पर पड़नेवाले वज्रों [हेति:- वज्रम् - नि० २।२०] का, कष्टों का (प्रतिधर्ता) = प्रतीकार करनेवाला है। घर पर होनेवाले आक्रमणों से बचाना पति का ही काम है, पति ही रक्षक है [हेतीनाम् = उपद्रवकारिणीनां परायुधानां प्रतिधर्ता निराकर्त्ता - म० ] । ५. (त्रिवृत्) = धर्मार्थकाम तीनों का होना और इसी रूप में होनेवाला (स्तोमः) = यह प्रभु - स्तवन (त्वा) = तुझे (पृथिव्याम्) = इस शरीर में श्रयतु सेवन करनेवाला हो। धर्मार्थकाम में सम्यक् वृत्ति शरीर में उत्तम निवास के लिए तेरी सहायता करे। ६. (उक्थम्) = [वक्तुमर्ह] प्रशंसनीय, स्तुति के योग्य (आज्यम्) = घृत अर्थात् प्रशंसनीय गोघृत तुझे (अव्यथायै) = किसी प्रकार की व्यथा - पीड़ा न होने देने के लिए (स्तभ्नातु) = थामे, दृढ़ करे। प्रशस्य गोघृत के , सेवन से तू सब रोग व पीड़ाओं से ऊपर उठ । ७. (रथन्तरं साम) = 'मुझे शरीररूप रथ से इस भवसागर को तैरना है, जीवन यात्रा को पूरा करना है' ऐसा निश्चय ही मानो प्रभु-स्तवन है । यह साम= प्रभु-स्तवन (अन्तरिक्षे) = हृदयान्तरिक्ष में (प्रतिष्ठित्या) = प्रतिष्ठिति के लिए हो । यह निश्चय मन में स्थिरता से रहे। यह तेरे जीवन का मौलिक सिद्धान्त बन जाए। ८. (देवेषु) = विद्वानों में जो (प्रथमजा:) = प्रथम विभाग में होनेवाले उच्चकोटि के (ऋषय:) = ज्ञानी हैं, वे दिवो (मात्रया) = अपने-अपने ज्ञान के अंश से, (वरिम्णा) = हृदय की विशालता से (प्रथन्तु) = तेरे जीवन की शक्तियों का विस्तार करें। ९. (विधर्त्ता) = आपत्तियों का प्रतीकार करनेवाला 'अग्निः', (च अयम् अधिपतिः) = और ये अधिष्ठातृरूपेण रक्षक निवासकदेव ते त्वा सर्वे और वे सारे ऋषि (संविदाना:) = ऐकमत्यवाले होकर (नाकस्य पृष्ठे) = जहाँ दुःख है ही नहीं, उस लोक के ऊपर (स्वर्गे लोके) = उत्तम कर्मों से अर्जनीय लोक में (त्वा) = तुझे (यजमानं च) = और यज्ञशील गृहपति को (सादयन्तु) = स्थापित करें |
Essence
भावार्थ- पत्नी ज्ञान - दीप्त, निरन्तर उन्नति पथ पर बढ़नेवाली हो, धर्मार्थ, काम का समानुपात में सेवन करती हो। घृतादि के प्रयोग से शरीर को स्वस्थ रक्खे। शरीररूप रथ से जीवन यात्रा को पूर्ण करने का निश्चय करे। पति 'अग्नि' = अग्रेणी हो । ऐसा होने पर घर स्वर्ग बन जाता है।
Subject
राज्ञी [गृहपत्नी]