Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 14 / Mantra 8

31 Mantra
14/8
Devata- दम्पती देवते Rishi- विश्वदेव ऋषिः Chhand- भुरिगतिजगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
प्रा॒णम्मे॑ पाह्यपा॒नम्मे॑ पाहि व्या॒नम्मे॑ पाहि॒ चक्षु॑र्मऽउ॒र्व्या विभा॑हि॒ श्रोत्र॑म्मे श्लोकय। अ॒पः पि॒न्वौष॑धीर्जिन्व द्वि॒पाद॑व॒ चतु॑ष्पात् पाहि दि॒वो वृष्टि॒मेर॑य॥८॥

प्रा॒णम्। मे॒। पा॒हि॒। अ॒पा॒नमित्य॑पऽआ॒नम्। मे॒। पा॒हि॒। व्या॒नमिति॑ विऽआ॒नम्। मे॒। पा॒हि॒। चक्षुः॑। मे॒। उ॒र्व्या। वि। भा॒हि॒। श्रोत्र॑म्। मे॒। श्लो॒क॒य॒। अ॒पः। पि॒न्व॒। ओष॑धीः। जि॒न्व॒। द्वि॒पादिति॑ द्वि॒ऽपात्। अ॒व॒। चतु॑ष्पात्। चतुः॑पा॒दिति॒ चतुः॑ऽपात्। पा॒हि॒। दि॒वः। वृष्टि॑म्। आ। ई॒र॒य॒ ॥८ ॥

Mantra without Swara
प्राणम्मे पाहि अपानम्मे पाहि व्यानम्मे पाहि चक्षुर्मऽउर्व्या विभाहि । श्रोत्रम्मे श्लोकय । अपः पिन्वौषधीर्जिन्व द्विपादव चतुष्पात्पाहि दिवो वृष्टिमेरय ॥

प्राणम्। मे। पाहि। अपानमित्यपऽआनम्। मे। पाहि। व्यानमिति विऽआनम्। मे। पाहि। चक्षुः। मे। उर्व्या। वि। भाहि। श्रोत्रम्। मे। श्लोकय। अपः। पिन्व। ओषधीः। जिन्व। द्विपादिति द्विऽपात्। अव। चतुष्पात्। चतुःपादिति चतुःऽपात्। पाहि। दिवः। वृष्टिम्। आ। ईरय॥८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र के पति-पत्नी से प्रभु कहते हैं कि हैं कि हे जीव ! (मे प्राणं पाहि) = मेरे दिये हुए प्राण की तू रक्षा करना । प्राणशक्ति का अपव्यय न करना। २. (मे अपानं पाहि) = मुझसे दी गई अपानशक्ति को सुरक्षित रखना। यही तेरे दोषों को दूर करके तेरे शरीर को निर्दोष बनाएगी। ३. (मे व्यानं पाहि) = मेरी दी हुई व्यानशक्ति की भी रक्षा करना । यह सारे शरीर में गति करती हुई तेरे सारे स्नायुसंस्थान को ठीक रक्खेगी । तुझे किसी प्रकार का नर्वससिस्टम का रोग पीड़ित न करेगा। ४. (मे चक्षुः) = मुझसे दी गई आँख को (उर्व्या) = विस्तीर्णता से (विभाहि) = विशिष्ट दीप्तिवाला करना। तेरा दृष्टिकोण सदा विशाल हो, संकुचित न हो। ५. (मे श्रोत्रं श्लोकय) = मेरे द्वारा प्रदत्त श्रोत्र को तू उत्तम शब्दों का सुननेवाला बनाना [श्लोक: - यश:, पद्यम्] । यह यश की ही बातें सुनें तथा ज्ञान की वाणियाँ ही इसे प्रिय हों। ६. इस सबके लिए (अपः पिन्व) = [पुष्णीहि-म० ] जलों का ही शरीर में पोषण कर - प्यास लगने पर जलों से ही गले को सींच। (ओषधी: जिन्व) [ प्राप्नुहि ] = भोजन के लिए ओषधियों को प्राप्त कर । वनस्पति ही तेरा भोजन हो । ७. इस सात्त्विक भोजन से सात्त्विक वृत्तिवाला बनकर तू (द्विपात् अव) = सब मनुष्यों की रक्षा कर, सभी का प्रीणन करनेवाला हो। (चतुष्पात् पाहि) = गौ आदि चौपायों का भी तू रक्षण करनेवाला बन। ८. (दिवः) = ज्ञान की (वृष्टिम् ऐरय) = वृष्टि को तू प्रेरित कर। स्वयं ज्ञान प्राप्त करके औरों को भी ज्ञान देनेवाला बन अथवा (दिवः वृष्टिम् ऐरय) = तू आकाश से वृष्टि को प्रेरित कर । नियमपूर्वक यज्ञादि कर्मों को करता हुआ तू 'निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु' इस प्रार्थना को क्रियान्वित करनेवाला बन ।
Essence
भावार्थ- मन्त्र में उल्लिखित आठ आदेशों का हम पालन करें। प्राण, अपान, व्यान की रक्षा करें, विशाल दृष्टि व उत्तम श्रवणवाले बनें, जलों व ओषधियों का ही ग्रहण करें, मनुष्य व अन्य प्राणियों का ध्यान करें और अन्त में यज्ञादि से सामयिक वर्षा को सिद्ध करें।
Subject
अपः + ओषधीः- आठ आदेश