Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 14 / Mantra 7

31 Mantra
14/7
Devata- वस्वादयो मन्त्रोक्ता देवताः Rishi- विश्वेदेवा ऋषयः Chhand- भुरिक्पङ्क्तिः,स्वराट्पक्तिः,निचृदाकृतुश् Swara- धैवतः,पञ्चमः
Mantra with Swara
स॒जूर्ऋ॒तुभिः॑ स॒जूर्वि॒धाभिः॑ स॒जूर्दे॒वैः स॒जूर्दे॒वैर्व॑योना॒धैर॒ग्नये॑ त्वा वैश्वान॒राया॒श्विना॑ध्व॒र्यू सा॑दयतामि॒ह त्वा॑ स॒जूर्ऋ॒तुभिः॑ स॒जूर्वि॒धाभिः॑ स॒जूर्वसु॑भिः स॒जूर्दे॒वैर्व॑योना॒धैर॒ग्नये॑ त्वा वैश्वान॒राया॒श्विना॑ऽध्व॒र्यू सा॑दयतामि॒ह त्वा॑ स॒जूर्ऋ॒तुभिः॑ स॒जूर्वि॒धाभिः॑ स॒जू रु॒द्रैः स॒जूर्दे॒वैर्व॑योना॒धैर॒ग्नये॑ त्वा वैश्वान॒राया॒श्विना॑ध्व॒र्यू सा॑दयतामि॒ह त्वा॑ स॒जूर्ऋ॒तुभिः॑ स॒जूर्वि॒धाभिः॑ स॒जूरा॑दि॒त्यैः स॒जूर्दे॒वैर्व॑योना॒धैर॒ग्नये॑ त्वा वैश्वान॒राया॒श्विना॑ध्व॒र्यू सा॑दयतामि॒ह त्वा॑ स॒जूर्ऋ॒तुभिः॑ स॒जूर्वि॒धाभिः॑ स॒जूर्वि॒श्वै॑र्दे॒वैः स॒जूर्दे॒वैर्व॑योना॒धैर॒ग्नये॑ त्वा वैश्वान॒राया॒श्विना॑ध्व॒र्यू सा॑दयतामि॒ह त्वा॑॥७॥

स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। ऋ॒तुभि॒रित्यृ॒तुऽभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। वि॒धाभि॒रिति॑ वि॒ऽधाभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। दे॒वैः। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। दे॒वैः। व॒यो॒ना॒धैरिति॑ वयःऽना॒धैः। अ॒ग्नये॑। त्वा॒। वै॒श्वा॒न॒राय॑। अ॒श्विना॑। अ॒ध्व॒र्यूऽइत्य॑ध्व॒र्यू। सा॒द॒य॒ता॒म्। इ॒ह। त्वा॒। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। ऋ॒तुभि॒रित्यृ॒तुऽभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। वि॒धाभि॒रिति॑ वि॒ऽधाभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। वसु॑भि॒रिति॒ वसु॑ऽभिः। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। दे॒वैः। व॒यो॒ना॒धैरिति॑ वयःऽना॒धैः। अ॒ग्नये॑। त्वा॒। वै॒श्वा॒न॒राय॑। अ॒श्विना॑। अ॒ध्व॒र्यूऽइत्य॑ध्व॒र्यू सा॒द॒य॒ता॒म्। इ॒ह। त्वा॒। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। ऋ॒तुभि॒रित्यृ॒तुऽभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। वि॒धाभि॒रिति॑ वि॒ऽधाभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। रु॒द्रैः। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। दे॒वैः। व॒यो॒ना॒धैरिति॑ वयःऽना॒धैः। अ॒ग्नये॑। त्वा॒। वै॒श्वा॒न॒राय॑। अ॒श्विना॑। अ॒ध्व॒र्यूऽइत्य॑ध्व॒र्यू। सा॒द॒य॒ता॒म्। इ॒ह। त्वा॒। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। ऋ॒तुभि॒रित्यृ॒तुऽभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। वि॒धाभि॒रिति॑ वि॒ऽधाभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। आ॒दि॒त्यैः। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। दे॒वैः। व॒यो॒ना॒धैरिति॑ वयःऽना॒धैः। अ॒ग्नये॑। त्वा॒। वै॒श्वा॒न॒राय॑। अ॒श्विना॑। अ॒ध्व॒र्यूऽइत्य॑ध्व॒र्यू। सा॒द॒य॒ता॒म्। इ॒ह। त्वा॒। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। ऋ॒तुभि॒रित्यृ॒तुऽभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। वि॒धाभि॒रिति॑ वि॒ऽधाभिः॑। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। विश्वैः॑। दे॒वैः। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। दे॒वैः। व॒यो॒ना॒धैरिति॑ वयःऽना॒धैः। अ॒ग्नये॑। त्वा॒। वै॒श्वा॒न॒राय॑। अ॒श्विना॑। अ॒ध्व॒र्यूऽइत्य॑ध्व॒र्यू। सा॒द॒य॒ता॒म्। इ॒ह। त्वा॒ ॥७ ॥

Mantra without Swara
सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्देवैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वानरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्वसुभिः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वानरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजू रुद्रैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वानरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजूरादित्यैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वानरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्विश्वैर्देवैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वानरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा ॥

सजूरिति सऽजूः। ऋतुभिरित्यृतुऽभिः। सजूरिति सऽजूः। विधाभिरिति विऽधाभिः। सजूरिति सऽजूः। देवैः। सजूरिति सऽजूः। देवैः। वयोनाधैरिति वयःऽनाधैः। अग्नये। त्वा। वैश्वानराय। अश्विना। अध्वर्यूऽइत्यध्वर्यू। सादयताम्। इह। त्वा। सजूरिति सऽजूः। ऋतुभिरित्यृतुऽभिः। सजूरिति सऽजूः। विधाभिरिति विऽधाभिः। सजूरिति सऽजूः। वसुभिरिति वसुऽभिः। सजूरिति सऽजूः। देवैः। वयोनाधैरिति वयःऽनाधैः। अग्नये। त्वा। वैश्वानराय। अश्विना। अध्वर्यूऽइत्यध्वर्यू सादयताम्। इह। त्वा। सजूरिति सऽजूः। ऋतुभिरित्यृतुऽभिः। सजूरिति सऽजूः। विधाभिरिति विऽधाभिः। सजूरिति सऽजूः। रुद्रैः। सजूरिति सऽजूः। देवैः। वयोनाधैरिति वयःऽनाधैः। अग्नये। त्वा। वैश्वानराय। अश्विना। अध्वर्यूऽइत्यध्वर्यू। सादयताम्। इह। त्वा। सजूरिति सऽजूः। ऋतुभिरित्यृतुऽभिः। सजूरिति सऽजूः। विधाभिरिति विऽधाभिः। सजूरिति सऽजूः। आदित्यैः। सजूरिति सऽजूः। देवैः। वयोनाधैरिति वयःऽनाधैः। अग्नये। त्वा। वैश्वानराय। अश्विना। अध्वर्यूऽइत्यध्वर्यू। सादयताम्। इह। त्वा। सजूरिति सऽजूः। ऋतुभिरित्यृतुऽभिः। सजूरिति सऽजूः। विधाभिरिति विऽधाभिः। सजूरिति सऽजूः। विश्वैः। देवैः। सजूरिति सऽजूः। देवैः। वयोनाधैरिति वयःऽनाधैः। अग्नये। त्वा। वैश्वानराय। अश्विना। अध्वर्यूऽइत्यध्वर्यू। सादयताम्। इह। त्वा॥७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे पत्नि ! तू (ऋतुभिः सजूः) = ऋतुओं के साथ समान प्रीतिवाली है। ऋतुओं की भाँति ही तू बड़ी व्यवस्थित गतिवाली है। २. (विधाभिः सजूः) = [ आपो वै विधा:, अद्भिर्हीद सर्वं विहितम् - श० ८।२।२१८] जलों के साथ तू समान प्रीतिवाली है। ऋतुओं से तूने मर्यादा सीखी, तो जलों से तू शान्ति का पाठ लेती है, तेरा स्वभाव शीतलता व माधुर्य है । ३. (देवैः सजूः) = तू दिव्य गुणों के साथ समान प्रीतिवाली है। सब दिव्य गुणों को अपनाने का पूर्ण प्रयत्न करती है। ४. (वयोनाधैः देवैः सजूः) = [प्राणा वै वयोनाधाः प्राणैर्हीदं सर्वं वयुनं नद्धम् श० ८।२।२८] तू देदीप्यमान प्राणों के साथ प्रीतिवाली है। तेरी प्राणशक्ति तुझे तेजस्विनी बनाती है। तू अपनी प्राणशक्ति से चमकती है। ५. (त्वा) = तुझे (अश्विनौ) = अध्वर्यू कर्मों में व्यापृत रहनेवाले यज्ञशील माता-पिता (इह) = इस गृहस्थ में (सादयताम्) = बिठाएँ। वे (त्वा) = तुझे (अग्नये) = प्रगतिशील व्यक्ति के लिए तथा (वैश्वानराय) = सबका भला करनेवाले के लिए देते हैं। आदर्श पति के लिए दो बातें आवश्यक हैं- एक तो वह प्रगतिशील हो proggressive mentality को लिये हुए हो। दूसरा यह कि वह यथासम्भव सभी का भला करे। अग्नि-जलों यजुर्वेदभाष्यम् हो, वैश्वानर हो। किसी से वैर-विरोध करनेवाला न हो। ६. (ऋतुभिः सजूः) = ऋतुओं के साथ तेरी प्रीति हो । उनके समान तू सब कार्य समय पर करनेवाली हो। (विधाभिः सजूः) = के साथ प्रीतिवाली हो, जलों की भाँति शान्त व मधुर बन । (वसुभिः सजूः) = वसुओं के साथ तेरा प्रेम हो, वसुओं के साथ अविरोध में चलती हुई तू अपने निवास को उत्तम बनानेवाली हो। (देवैः वयोनाधैः सजूः) = [छन्दांसि वै देवा वयोनाधाः छन्दाभिदं सर्वं प्रज्ञानं नद्धम् - श० ८।२।२८] ज्ञान ज्योति देनेवाले शब्दों से तेरी प्रीति हो, छन्दों के ज्ञान से अपने को आच्छादित करके वासनाओं के आक्रमण से तू अपने को सुरक्षित करनेवाली हो। (अश्विनौ अध्वर्यू) = कार्यों को कल पर न टालनेवाले यज्ञ के प्रवर्त्तक तेरे माता-पिता (त्वा) = तुझे (अग्नये वैश्वानराय) = अग्नि के समान प्रकाशमान [भद्रं वर्णं पुष्यन्] तथा सबको आगे ले चलनेवाले [विश्वान् नरान् नयति ] नेतृत्व देनेवाले व्यक्ति के लिए (इह) = यहाँ (सादयताम्) = प्राप्त कराएँ । ऐसे ही व्यक्ति को तेरा जीवन-सखा बनाएँ। ७. (ऋतुभिः सजूः) = तू ऋतुओं की साथी बन । उनकी भाँति नियमित गतिवाली हो। (विधाभिः सजूः) = जलों की साथी हो । उनकी भाँति सब वस्तुओं का निर्माण करनेवाली हो [ विदधति इति विधा:] (रुद्रैः सजूः) = एकादश रुद्रों की तू संगिनी हो । दस प्राण व आत्मा तुझे प्रिय हों, इनकी उन्नति में तू अपनी उन्नति समझे । (देवैः वयोनाधैः सजूः) = इन शक्ति देनेवाले प्राणों के साथ तेरा साथ बना रहे। (अश्विनौ अध्वर्यू) = प्राणापान- शक्तिसम्पन्न परन्तु अहिंसात्मक [ अ + ध्वर] जीवनवाले तेरे माता-पिता (त्वा) = तुझे (इह) = यहाँ गृहस्थ में (अग्नये वैश्वानराय) = [ अगि गतौ] क्रियाशील व सर्वहितकर्त्ता व्यक्ति के लिए (सादयताम्) = प्राप्त कराएँ। ८. (ऋतुभिः सजूः) = तू ऋतुओं की सखी हो, उनमें ग्रीष्म से शुचिता का, वर्षा से आनन्द वर्षण का, शरत् से वासनाओं के शीर्ण करने का, हेमन्त से वृद्धि का, शिशिर से द्रुतगति-स्फूर्ति का तथा वसन्त से चारों ओर सुगन्ध फैलाने का पाठ तू पढ़। (विधाभिः सजूः) = जलों की तू सखी हो। जलों के समान तू नैर्मल्यवाली हो। (आदित्यैः सजूः) = बारह आदित्यों की तू सखी बन। उनसे शिक्षा ग्रहण करके संसार वृक्ष की विशिष्ट शाखा बनने का निश्चय कर [विशाखा], ज्येष्ठ बनने का संकल्प रख [ज्येष्ठ], कामादि से पराभूत न हो [ अ + षाढ़ा], सदुपदेशों का श्रवण कर [श्रवणा], तेरा मार्ग सदा कल्याण का हो [भाद्रपदा], कल-कल की उपासना करनेवाली न हो [ अश्विनी], शत्रुओं का अभी से छेदन प्रारम्भ कर [ कृतिका], अपने अन्दर छिपे हुए कामादि शत्रुओं को ढूँढनेवालों में तू अग्रणी बन [मृगशिरस् ], इन्हें मारकर तू अपना वास्तविक पोषण साध [पुष्य], यह निश्चय कर कि तुझसे पाप न हो [ मघा = मा अघ ] । इसी निष्पापता को सच्चा ऐश्वर्य समझ [ मघ - ऐश्वर्य] उस समय यह प्रलोभनमय संसार तेरे लिए तुच्छ हो जाएगा [ फल्गुनी, फल्गु-फोक] इस आश्चर्य को अपने जीवन में करनेवाली तू चित्रा होगी। यही आदित्यों का सखित्व है। (देवैः वयोनाधैः सजूः) = शक्तिप्रद प्राणों की तू सखी बन । आदित्य तो हैं ही प्राण । (त्वा) = ऐसी तुझे (अश्विनौ अध्वर्यू) = सदा क्रियाशील यज्ञमय जीवनवाले माता-पिता (अग्नये वैश्वानराय) = अग्निवत् सब दोषों का भस्म करनेवाले, सर्वहित साधक व्यक्ति के लिए (इह) = इस गृहस्थ में (सादयताम्) = प्राप्त कराएँ । ९. (ऋतुभिः सजूः) = तू ऋतुओं के साथ मित्रतावाली हो, ऋतुगामिनी हो। (विधाभिः सजूः) = जलों की तरह निरन्तर कर्मों में व्याप्त होती हुई उनकी सखी बन । (विश्वैः देवैः सजूः) = इस कर्मव्याप्ति द्वारा सब दिव्य गुणों की सङ्गिनी बन । (देवैः वयोनाधैः सजूः) = उत्तम जीवन के साथ सम्बद्ध करनेवाले [वय: +न ह्] देवों के साथ तेरी मित्रता हो । (त्वा) = तुझे (इह) = इस गृहस्थाश्रम में (अश्विनौ अध्वर्यू) = प्राणापान शक्ति सम्पन्न, यज्ञिय वृत्तिवाले माता-पिता (अग्नये वैश्वानराय) = आगे बढ़नेवाले, सर्वहित साधक व्यक्ति के लिए ही (सादयताम्) = प्राप्त कराएँ ।
Essence
भावार्थ- पत्नी नियमित जीवनवाली, शान्त, मधुर स्वभाववाली, दिव्य गुणोंवाली, प्राणशक्ति सम्पन्न हो [ नाजुक नहीं] और पति 'अग्नि' - उन्नतिशील व 'वैश्वानर' सबका भला ही करनेवाला हो। ऐसा होने पर ही ये प्रस्तुत मन्त्र के ऋषि 'विश्वेदेवाः' बन सकेंगे।
Subject
'अग्नि- वैश्वानर'