Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 14 / Mantra 31

31 Mantra
14/31
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- विश्वदेव ऋषिः Chhand- निचृदतिधृतिः Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नव॑विꣳशत्याऽस्तुवत॒ वन॒स्पत॑योऽसृज्यन्त॒ सोमोऽधि॑पतिरासी॒त्। एक॑त्रिꣳशताऽस्तुवत प्र॒जाऽ अ॑सृज्यन्त॒ यवा॒श्चाय॑वा॒श्चाधि॑पतयऽआस॒न्। त्रय॑स्त्रिꣳशताऽस्तुवत भू॒तान्य॑शाम्यन् प्र॒जाप॑तिः परमे॒ष्ठ्यधि॑पतिरासीत्॥३१॥

नव॑विꣳश॒त्येति॒ नव॑ऽविꣳशत्या। अ॒स्तु॒व॒त॒। वन॒स्पत॑यः। अ॒सृ॒ज्य॒न्त॒। सोमः॑। अधि॑पति॒रित्यधि॑ऽपतिः। आ॒सी॒त्। एक॑त्रिꣳश॒तेत्येक॑ऽत्रिꣳशता। अ॒स्तु॒व॒त॒। प्र॒जा इति॑ प्र॒ऽजाः। अ॒सृ॒ज्य॒न्त॒। यवाः॑। च॒। अय॑वाः। च॒। अधि॑पतय॒ इत्यधि॑ऽपतयः। आ॒स॒न्। त्रय॑स्त्रिꣳश॒तेति॒ त्रयः॑ऽत्रिꣳशता। अ॒स्तु॒व॒त॒। भू॒तानि॑। अ॒शा॒म्य॒न्। प्र॒जाप॑ति॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तिः। प॒र॒मे॒ष्ठी। प॒र॒मे॒ऽस्थीति॑ परमे॒ऽस्थी। अधि॑पति॒रित्यधि॑ऽपतिः। आ॒सी॒त् ॥३१ ॥

Mantra without Swara
नवविँशत्यास्तुवत वनस्पतयोसृज्यन्त सोमोधिपतिरासीदेकत्रिँशतास्तुवत प्रजाऽअसृज्यन्त यवाश्चायवाश्चाधिपतयऽआसँस्त्रयस्त्रिँशतास्तुवत भूतान्यशाम्यन्प्रजापतिः परमेष्ठ्यधिपतिरासील्लोकन्ताऽइन्द्रम्॥ गलितमन्त्रा--- लोकम्पृण च्छिद्रम्पृणाथो सीद धु्रवा त्वम् । इन्द्राग्नी त्वा बृहस्पतिरस्मिन्योनावसीषदन् ॥ ताऽअस्य सूददोहसः सोमँ श्रीणन्ति पृश्नयः । जन्मन्देवानाँविशस्त्रिष्वा रोचने दिवः ॥ इन्द्रँविश्वाऽअवीवृधन्त्समुद्रव्यचसङ्गिरः रथीतमँ रथीनां वाजानाँ सत्पतिम्पतिम्॥

नवविꣳशत्येति नवऽविꣳशत्या। अस्तुवत। वनस्पतयः। असृज्यन्त। सोमः। अधिपतिरित्यधिऽपतिः। आसीत्। एकत्रिꣳशतेत्येकऽत्रिꣳशता। अस्तुवत। प्रजा इति प्रऽजाः। असृज्यन्त। यवाः। च। अयवाः। च। अधिपतय इत्यधिऽपतयः। आसन्। त्रयस्त्रिꣳशतेति त्रयःऽत्रिꣳशता। अस्तुवत। भूतानि। अशाम्यन्। प्रजापतिरिति प्रजाऽपतिः। परमेष्ठी। परमेऽस्थीति परमेऽस्थी। अधिपतिरित्यधिऽपतिः। आसीत्॥३१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रभु से (वनस्पतयः) = वनस्पतियाँ (असृज्यन्त) = बनाई गईं [जो सम्भवतः २९ प्रकार की थी - २९ जातियों में विभक्त थीं] । मानव जीवन में इन वनस्पतियों का स्थान स्पष्ट है। मनुष्य इन्हीं के उपयोग से अपने शरीर, मन व बुद्धि को पूर्ण स्वस्थ बनाता है। इन्हें वनस्पति नाम इसीलिए दिया गया कि ये मानवरूपी गृह [वन = a house] की रक्षा करती हैं। इस मानव-शरीर में (वनस्) = ज्ञानकिरणों की रक्षा करती हैं-बुद्धि को सात्त्विक बनानेवाली हैं। मनुष्य को चाहिए कि (नवविंशत्या) = हाथ-पैर की अंगुलियों व नौ प्राणों इन २९ से (अस्तुवत) = उस प्रभु का स्तवन करें कि (सोमः) = हमारे जीवनों में इन वनस्पतियों के प्रयोग से सौम्यता का वर्धन करनेवाला वह 'सोम' नामक प्रभु (अधिपतिः आसीत्) = अधिष्ठातृरूपेण हमारा रक्षक है । २. अब इन वनस्पतियों के द्वारा (प्रजाः) = सब प्रकार के विकासों [प्र+जन्] का (असृज्यन्त) = सर्जन हुआ। मनुष्य को चाहिए कि (एकत्रिंशता) = बीस अंगुलियाँ, दस प्राण तथा इकतीसवें आत्मा से अस्तुवत उस प्रभु का स्तवन करे कि (यवाः च) = हमारे साथ सब अच्छाइयों का मिश्रण करनेवाले 'यवा:' नामवाले वे प्रभु तथा (अयवा: च) = हमारी सब बुराइयों को दूर करनेवाले 'अयवा:' नामवाले प्रभु (अधिपतयः आसन्) = हमारे अधिष्ठातृरूपेण रक्षक हैं। ब्राह्मणग्रन्थों के अनुसार शुक्ल पूर्वपक्ष 'यव' हैं, कृष्ण अपरपक्ष 'अयव' हैं। वे प्रभु भी हमारे अन्दर शुक्लपक्ष की भाँति एक-एक गुणकला को भरनेवाले हैं तथा कृष्णपक्ष की भाँति एक-एक दोषकला को क्षीण करनेवाले हैं। ३. इस प्रकार सब विकासों के हो जाने पर अथवा गुणपूर्ति व दोष-निराकरण हो जाने पर (भूतानि अशाम्यन्) = सब प्राणी पूर्णरूप से शान्ति का अनुभव करनेवाले हुए। हमें चाहिए कि हम (त्रयस्त्रिंशता) = सब अंगुलियों, प्राणों, दो आधारभूत पाँव तथा आत्मा से (अस्तुवत) = उस प्रभु का स्तवन करें कि वे प्रभु (प्रजापतिः) = हम सब प्रजाओं के रक्षक हैं, (परमेष्ठी) = सर्वोच्च स्थान में स्थित हैं-अपने भक्तों को भी सर्वोच्च स्थान में पहुँचानेवाले हैं, अधिपतिः आसीत् वे ही हमारे अधिष्ठातृरूपेण रक्षक हैं।
Essence
भावार्थ- प्रभु विविध वनस्पतियों के उत्पादन द्वारा हमारी सब शक्तियों के विकास का कारण बनते हैं और हमारे जीवनों में शान्ति उत्पन्न करते हैं। हम उस प्रभु का 'सोम, यव, अयव तथा प्रजापति, परमेष्ठी' नाम से स्तवन करें।
Subject
उनत्तीस- इकतीस - तेतीस