Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 14 / Mantra 29

31 Mantra
14/29
Devata- ईश्वरो देवता Rishi- विश्वदेव ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप्, ब्रह्मी जगती Swara- धैवतः, निषादः
Mantra with Swara
न॒वभि॑रस्तुवत पि॒तरो॑ऽसृज्य॒न्तादि॑ति॒रधि॑पत्न्यासीत्। एकाद॒शभि॑रस्तुवतऽ ऋ॒तवो॑ऽसृज्यन्तार्त्त॒वाऽ अधि॑पतयऽआसन्। त्रयोद॒शभि॑रस्तुवत॒ मासा॑ऽ असृज्यन्त संवत्स॒रोऽधि॑पतिरासीत्। पञ्चद॒शभि॑रस्तुवत क्ष॒त्रम॑सृज्य॒तेन्द्रोऽधि॑पतिरासीत्। सप्तद॒शभि॑रस्तुवत ग्रा॒म्याः प॒शवो॑ऽसृज्यन्त॒ बृह॒स्पति॒रधि॑पतिरासीत्॥२९॥

न॒वभि॒रिति॑ न॒वऽभिः॑। अ॒स्तु॒व॒त॒। पि॒तरः॑। अ॒सृ॒ज्य॒न्त॒। अदि॑तिः। अधि॑प॒त्नीत्यधि॑ऽपत्नी। आ॒सी॒त्। ए॒का॒द॒शभि॒रित्ये॑काऽद॒शभिः॑। अ॒स्तु॒व॒त॒। ऋ॒तवः॑। अ॒सृ॒ज्य॒न्त॒। आ॒र्त्त॒वाः। अधि॑पतय॒ इत्यधि॑ऽपतयः। आ॒स॒न्। त्र॒यो॒द॒शभि॒रिति॑ त्रयोद॒शऽभिः॑। अ॒स्तु॒व॒त॒। मासाः॑। अ॒सृ॒ज्य॒न्त॒। सं॒व॒त्स॒रः। अधि॑पति॒रित्यधि॑ऽपतिः। आ॒सी॒त्। प॒ञ्च॒द॒शभि॒रिति॑ पञ्चऽद॒शभिः॑। अ॒स्तु॒व॒त॒। क्ष॒त्रम्। अ॒सृ॒ज्य॒त॒। इन्द्रः॑। अधि॑पति॒रित्यधि॑पतिः। आ॒सी॒त्। स॒प्त॒द॒शभि॒रिति॑ सप्तऽद॒शभिः॑। अ॒स्तु॒व॒त॒। ग्रा॒म्याः। प॒शवः॑। अ॒सृ॒ज्य॒न्त॒। बृह॒स्पतिः॑। अधि॑पति॒रित्यधि॑ऽपतिः। आ॒सी॒त् ॥२९ ॥

Mantra without Swara
नवभिरस्तुवत पितरोसृज्यन्तादितिरध्निपत्न्यासीदेकादशभिरस्तुवतऽऋतवोसृज्यन्तार्तवाऽअधिपतयऽआसँस्त्रयोदशभिरस्तुवत मासाऽअसृज्यन्त सँवत्सरोधिपतिरासीत्पञ्चदशभिरस्तुवत क्षत्रमसृज्यतेन्द्रोधिपतिरासीत्सप्तदशभिरस्तुवत ग्राम्याः पशवोसृज्यन्त बृहस्पतिरधिपतिरासीन्नवदशभिरस्तुवत ॥

नवभिरिति नवऽभिः। अस्तुवत। पितरः। असृज्यन्त। अदितिः। अधिपत्नीत्यधिऽपत्नी। आसीत्। एकादशभिरित्येकाऽदशभिः। अस्तुवत। ऋतवः। असृज्यन्त। आर्त्तवाः। अधिपतय इत्यधिऽपतयः। आसन्। त्रयोदशभिरिति त्रयोदशऽभिः। अस्तुवत। मासाः। असृज्यन्त। संवत्सरः। अधिपतिरित्यधिऽपतिः। आसीत्। पञ्चदशभिरिति पञ्चऽदशभिः। अस्तुवत। क्षत्रम्। असृज्यत। इन्द्रः। अधिपतिरित्यधिपतिः। आसीत्। सप्तदशभिरिति सप्तऽदशभिः। अस्तुवत। ग्राम्याः। पशवः। असृज्यन्त। बृहस्पतिः। अधिपतिरित्यधिऽपतिः। आसीत्॥२९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (पितरः असृज्यन्त) = [पितर :- नव जगद्रक्षका रश्मयः । नव वै प्राणाः सप्तशीर्षन्नवाञ्चौ द्वौ- - श० ८।४।३।७] ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ रक्षा करने के प्रमुख साधन होने से यहाँ 'पितरः' [पा रक्षणे] कही गई हैं। यद्यपि ये पाँच-पाँच होकर दस हैं तथापि 'जिह्वा' रस ग्रहण करने से ज्ञानेन्द्रियों में तथा शब्द बोलने से कर्मेन्द्रियों में परिगणित होती है, अतः यह दोनों ओर एक ही है। एवं, ये मिलकर वस्तुतः नौ हैं। ये नौ इन्द्रियाँ ज्ञानेन्द्रियों के क्षेत्र में रश्मियाँ व किरणें हैं, कर्मेन्द्रियों की दृष्टि से ये रश्मियाँ लगामें हैं। ये सब रक्षक इन्द्रियाँ प्रभु से उत्पन्न की गई हैं। इनकी रचना के सौन्दर्य व अद्भुतता को देखकर (नवभिः) = इन नौ इन्द्रियों से प्रजाएँ अस्तुवत उस प्रभु का स्तवन करें कि (अदितिः) = इन इन्द्रियों के निर्माण से हमारा खण्डन न होने देनेवाली वह जगज्जननी ही हमारी (अधिपत्नी आसीत्) = पालिका अधिष्ठात्री देवी है। खण्डन न होने देने के कारण ही वह 'अदिति' नामवाली है । २. (ऋतवः) = ऋतुएँ (असृज्यन्त) = उत्पन्न की गईं। एक-एक ऋतु जीव को शक्ति देनेवाली है। ऋतुचर्या के ठीक पालन से जीव के सब प्राण व सब इन्द्रियाँ बड़े शक्तिशाली बने रहते हैं। इनको शक्ति प्राप्त कराने के लिए उस उस ऋतु में वनस्पतियों से समपोषयुक्त वे-वे ओषधियाँ प्राप्त होती हैं। इसी से ब्राह्मणों में हम पढ़ते हैं कि 'ऋतवः वै पृष्ठानि' (श० १।३।३।२।१) 'वीर्यं वै पृष्ठानि' [ता० ४।८।७] ऋतुएँ हमारी पृष्ठ [backbone] व वीर्यशक्ति हैं, अतः जीव (एकादशभिः) = [दश प्राणा आत्मैकादश:- श० २।४।३१८] दश प्राणों व आत्मा से (अस्तुवत) = उस प्रभु का स्तवन करें कि किस प्रकार 'आर्तवा:' [ऋतुषु भवा गुणा:- द०] उस-उस ऋतु के गुण- खूबियाँ (अधिपतयः आसन्) = हमारा सम्यक् पालन करनेवाले हैं। ३. (मासा असृज्यन्त) = महीने [वैशाख आदि बारह मास तथा १३वाँ मलमास, वेद के शब्दों में ' अहंसस्पति'] उत्पन्न किये गये। 'मासो मानात् - नि० ४।२७' ये हमारे जीवन का निर्माण करते हैं। 'यव्या मासा - श० १।७।२।२६' ये हमारे शरीर के अवगुणों को दूर करनेवाले तथा गुणों का शरीर में उपचय करनेवाले हैं। यु-इस मिश्रण व अमिश्रण की क्रिया में ये उत्तम हैं। इस प्रकार ये हमारे जीवन को उत्तम बनाते हैं। हमें चाहिए कि (मासाः = त्रयोदशभिः अस्तुवत) = [दश प्राणाः प्रतिष्ठे एक आत्मा - श० ८।४।३।८] अपने दश प्राणों दो आधारभूत पाँव व आत्मा से उस प्रभु का स्तवन करें, जो इन तेरह मासों के द्वारा हमारे निवास को उत्तम बनाने के कारण 'संवत्सर: ' [ उत्तम निवासक] संवत्सर नामवाला होता हुआ (अधिपतिः आसीत्) = अधिष्ठातृरूपेण रक्षक है। ये मास उस 'संवत्सर' के ही कर्मकररक्षणात्मक कर्म करनेवाले हैं। [ मासाः संवत्सरस्य कर्मकराः - तै० ३।११।१०।३] ये उस प्रभु के कर्मकर हमारे जीवन को निरन्तर उन्नत करनेवाले हैं। उन्नत करने से ही 'उदाना:- ता० ५।२० ' इन्हें 'उदान' कहा गया है 'उत्कर्षेण आनयन्ति । ४. ऋतुचर्या व मासचर्या के ठीक चलने के परिणामरूप ही अब (क्षत्रम्) = क्षत्रिय वर्ण की विशेषता का सम्पादक यह बल (असृज्यत) = उत्पन्न किया गया। सबल बनी हुई (पञ्चदशभि:) = [ दश हस्त्या अंगुलयश्चत्वारि दोर्बाहवाणि यदूर्ध्वं नाभेस्तत् पंचदशम् श० ८।४।३।१०] हाथ की दस अंगुलियों, दो हाथों, दो बाहुओं तथा नाभि से उपरले शरीरभाग से (अस्तुवत) = उस प्रभु का स्तवन करो कि (इन्द्रः) = सब ऐश्वर्य का स्वामी, सब शक्तियों का स्रोत [ इन्द to be powerful ] वह प्रभु अधिपतिः (आसीत्) = हमारा अधिष्ठातृरूपेण रक्षक है। हमारे सब अङ्गों को वह सबल बनाकर हमारा पालन कर रहा है। ५. बल व शक्ति को प्राप्त कराने के लिए ही जीवन की आवश्यक सामग्रियों को दूध तथा वस्त्रादि के लिए ऊन आदि को प्राप्त करानेवाले (ग्राम्याः पशवः) = ग्राम्य पशु [जो संख्या में सम्भवतः सत्रह जातियों के हैं] (असृज्यन्त) = उत्पन्न किये गये। इन पशुओं के महत्त्व को समझते हुए हम (सप्तदशभिः अस्तुवत) = [दश पाद्या अंगुलयश्चत्वार्यूर्वष्ठीवानि द्वे प्रतिष्ठे यदवाङ् नाभेस्तत् सप्तदशम् - श० ८|४ | ३ | ११ ] अपने पाँवों की दस अंगुलियों, दो घुटने, दो जाँघों, दो पाँव व सतरहवें नाभि के अधः देश से उस प्रभु का स्तवन करें कि वह (बृहस्पतिः) = ऊँचे-से-ऊँचे ज्ञान का पति प्रभु वेदज्ञान के देने से हमारा (अधिपतिः आसीत्) = रक्षक है। वह प्रभु वेद द्वारा इन सब पशुओं से उपयुक्त सामग्री प्राप्त करने का उपदेश देता है और इस प्रकार इन्हें हमारे जीवन के साथ जोड़ देता है।
Essence
भावार्थ- हमारा रोम-रोम उस प्रभु का स्तवन अदिति, आर्तव संवत्सर, इन्द्र व बृहस्पति' इन नामों से कर रहा हो।
Subject
नौ- ग्यारह-तेरह - पन्द्रह - सत्रह