Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 14 / Mantra 22

31 Mantra
14/22
Devata- विदुषी देवता Rishi- विश्वदेव ऋषिः Chhand- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
यन्त्री॒ राड् य॒न्त्र्यसि॒ यम॑नी ध्रु॒वासि॒ धरि॑त्री। इ॒षे त्वो॒र्जे त्वा॑ र॒य्यै त्वा॒ पोषा॑य त्वा॥२२॥

यन्त्री॑। राट्। य॒न्त्री। अ॒सि॒। यम॑नी। ध्रु॒वा। अ॒सि॒। धरि॑त्री। इ॒षे। त्वा॒। ऊ॒र्ज्जे। त्वा॒। र॒य्यै। त्वा॒। पोषा॑य। त्वा॒ ॥२२ ॥

Mantra without Swara
यन्त्री राड्यन्त्र्यसि यमनी धु्रवासि धरित्री । इषे त्वोर्जे त्वा रय्यै त्वा पोषाय त्वा लोकन्ताऽइन्द्रम्॥ गलितमन्त्रा----- लोकम्पृण च्छिद्रम्पृणाथो सीद धु्रवा त्वम् । इन्द्राग्नी त्वा बृहस्पतिरस्मिन्योनावसीषदन् ॥ ताऽअस्य सूददोहसः सोमँ श्रीणन्ति पृश्नयः । जन्मन्देवानाँविशस्त्रिष्वा रोचने दिवः । इन्द्रँविश्वाऽअवीवृधन्त्समुद्रव्यचसङ्गिरः । रथीतमँ रथीनाँवाजानाँ सत्पतिम्पतिम् ॥

यन्त्री। राट्। यन्त्री। असि। यमनी। ध्रुवा। असि। धरित्री। इषे। त्वा। ऊर्ज्जे। त्वा। रय्यै। त्वा। पोषाय। त्वा॥२२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. तू (यन्त्री) = अपने जीवन पर पूर्ण नियन्त्रण रखनेवाली है और इसी का परिणाम है कि तू (राट्) = चमकती है। जैसे नियमित गति के कारण सूर्य चमकता है, उसी प्रकार नियमित जीवनवाला व्यक्ति भी चमकता है। २. और वस्तुतः (यन्त्री असि) = तू अपने जीवन को नियन्त्रण में रखनेवाली है, अतएव (यमनी) = सबको नियमित जीवनवाला बनाती है। सबको नियम में वही रख सकता है जो स्वयं अपने को नियमित बनाये । ३. (ध्रुवा असि) = पृथिवी के समान तू ध्रुवा है [ध्रुवा = पृथिवी - श० १।३।२।४], अतएव (धरित्री) = सबका धारण व पोषण करनेवाली है। स्वयं अध्रुव जीवनवाला औरों का धारण नहीं कर सकता। ४. पत्नी कहती है कि मैं (त्वा) = = तुझे अपना जीवन - सखा बनाती हूँ, (इषे) = अन्न- प्राप्ति के लिए। हमारे घर में 'अन्न की कमी न होने देना' यह आपका पहला कर्त्तव्य है। मैं (ऊर्जे त्वा) = आपको वरती हूँ, जिससे हमारा जीवन बल व प्राणशक्ति सम्पन्न बने। 'ऊ वै रस : ' हमारे घर में उस गोरस व दूध की कमी न हो जो हम सबके जीवनों को बल व प्राणशक्ति सम्पन्न बनाएगा । (रय्यै त्वा) = मैंने आपका वरण इसलिए किया है कि आप घर के कार्य सञ्चालन के लिए पर्याप्त धन का अर्जन करनेवाले होंगे। (पोषाय त्वा) = उचित धनार्जन के द्वारा सबका पोषण करने के लिए मैंने आपका वरण किया है।
Essence
भावार्थ- पत्नी को चाहिए कि अपने जीवन को नियमित बनाकर घर में सबके जीवन को व्यवस्थित करनेवाली हो। पति ने अन्न, रस, धन व पोषण का ध्यान करना है। इस प्रकार अपने-अपने कर्त्तव्य को करने से इनका यह लोक अच्छा बनेगा।
Subject
यन्त्री-यमनी