Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 14 / Mantra 16

31 Mantra
14/16
Devata- ऋतवो देवताः Rishi- विश्वेदेवा ऋषयः Chhand- उतकृतिः Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ॒षश्चो॒र्जश्च॑ शार॒दावृ॒तूऽ अ॒ग्नेर॑न्तःश्लेषोऽसि॒ कल्पे॑तां॒ द्यावा॑पृथि॒वी कल्प॑न्ता॒माप॒ऽ ओष॑धयः॒ कल्प॑न्ताम॒ग्नयः॒ पृथ॒ङ् मम॒ ज्यैष्ठ्या॑य॒ सव्र॑ताः। येऽ अ॒ग्नयः॒ सम॑नसोऽन्त॒रा द्यावा॑पृथि॒वीऽ इ॒मे। शा॒र॒दावृ॒तूऽ अ॑भि॒कल्प॑माना॒ऽ इन्द्र॑मिव दे॒वाऽ अ॑भि॒संवि॑शन्तु॒ तया॑ दे॒वत॑याङ्गिर॒स्वद् ध्रु॒वे सी॑दतम्॥१६॥

इ॒षः। च॒। ऊ॒र्जः। च। शा॒र॒दौ। ऋ॒तूऽइत्यृ॒तू। अ॒ग्नेः। अ॒न्तः॒श्ले॒ष इत्य॑न्तःऽश्ले॒षः। अ॒सि॒। कल्पे॑ताम्। द्यावा॑पृथि॒वी इति॒ द्यावा॑ऽपृथि॒वी। कल्प॑न्ताम्। आपः॑। ओष॑धयः। कल्प॑न्ताम्। अ॒ग्नयः॑। पृथ॑क्। मम॑। ज्यैष्ठ्याय॑। सव्र॑ता॒ इति॒ सऽव्र॑ताः। ये। अ॒ग्नयः॑। सम॑नस॒ इति॒ सऽम॑नसः। अ॒न्त॒रा। द्यावा॑पृथि॒वी इति॒ द्यावा॑पृथि॒वी। इ॒मेऽइती॒मे। शा॒र॒दौ। ऋ॒तूऽइत्यृ॒तू। अ॒भि॒कल्प॑माना॒ इत्य॑भि॒ऽकल्प॑मानाः। इन्द्र॑मि॒वेतीन्द्र॑म्ऽइव। दे॒वाः। अ॒भि॒संवि॑श॒न्त्वित्य॑भि॒ऽसंवि॑शन्तु। तया॑। दे॒वत॑या। अ॒ङ्गि॒र॒स्वत्। ध्रु॒वेऽइति॑ ध्रु॒वे। सी॒द॒त॒म् ॥१६ ॥

Mantra without Swara
इषश्चोर्जश्च शारदावृतूऽअग्नेरन्तःश्लेषो सि कल्पेतान्द्यावापृथिवी कल्पन्तापऽओषधयः कल्पन्तामग्नयः पृथङ्मम ज्यैष्ठ्याय सव्रताः । येऽअग्नयः समनसोन्तरा द्यावापृथिवीऽइमे शारदावृतूऽअभिकल्पमानाऽइन्द्रमिव देवाऽअभिसँविशन्तु तया देवतयाङ्गिरस्वद्धरुवे सीदतम् ॥

इषः। च। ऊर्जः। च। शारदौ। ऋतूऽइत्यृतू। अग्नेः। अन्तःश्लेष इत्यन्तःऽश्लेषः। असि। कल्पेताम्। द्यावापृथिवी इति द्यावाऽपृथिवी। कल्पन्ताम्। आपः। ओषधयः। कल्पन्ताम्। अग्नयः। पृथक्। मम। ज्यैष्ठ्याय। सव्रता इति सऽव्रताः। ये। अग्नयः। समनस इति सऽमनसः। अन्तरा। द्यावापृथिवी इति द्यावापृथिवी। इमेऽइतीमे। शारदौ। ऋतूऽइत्यृतू। अभिकल्पमाना इत्यभिऽकल्पमानाः। इन्द्रमिवेतीन्द्रम्ऽइव। देवाः। अभिसंविशन्त्वित्यभिऽसंविशन्तु। तया। देवतया। अङ्गिरस्वत्। ध्रुवेऽइति ध्रुवे। सीदतम्॥१६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. तुम (इष:) = [इष प्रेरणे - प्र + ईर=प्रकृष्ट गति] प्रकृष्ट गतिवाले होओ (च) = तथा (ऊर्ज:) = बल व प्राणशक्ति-सम्पन्न बनो। ('इष') = आश्विनमास का नाम है - इसी में क्षत्रिय घोड़ों को [अश्वों को] काठी लगाकर यात्राओं के लिए निकलते हैं, उसी प्रकार तुम्हारा जीवन भी इन्द्रियाश्वों पर आरुढ़ होकर गतिवाला हो। आत्मवश्य इन्द्रियों से विचरण ही यात्रापूर्ति का साधन है। ('ऊर्ज') = कार्त्तिक मास का नाम है-'कृन्तन' - शत्रुओं का छेदन-भेदन करने के लिए तुम्हें भी बल व पराक्रमवाला बनना है। २. शक्तिशाली बनकर (शारदौ) = तुम शारद बनो - शत्रुओं को शीर्ण करनेवाले बनों। जैसे शरद में सब पत्ते झड़ जाते हैं, उसी प्रकार तुमसे सब बुराइयाँ झड़ जाएँ। (ॠतू) = तुम नियमित गतिवाले बनो। ३. (अग्नेः अन्तः श्लेषः असि) = हृदय में प्रभु का आलिङ्गन करनेवाले बनों । ४. (द्यावापृथिवी कल्पेताम्) = तुम्हारे शरीर व मस्तिष्क शक्तिशाली हों । ५. उसके लिए (आपः ओषधयः कल्पन्ताम्) = जल व ओषधियाँ तुम्हें शक्तिशाली बनाएँ। ६. (अग्नयः) = माता-पिता व आचार्यरूप अग्नियाँ (मम ज्यैष्ठयाय) = मेरी ज्येष्ठता के सम्पादन के लिए (सव्रताः) = समान व्रतवाले होकर (पृथक्) = अलग-अलग, क्रमशः ५, ८ व २५ वर्ष तक (कल्पन्ताम्) = समर्थ हों। ये मेरे जीवन को खूब उन्नत कर दें। ७. (इमे द्यावापृथिवी अन्तरा) = इस द्युलोक व पृथिवीलोक के मध्य में (अग्नयः) = जो भी माता-पिता व आचार्य हैं, वे (समनसः) = समान मनवाले हों। उनकी समानरूप से एक ही कामना हो कि इस राष्ट्र की भावी सन्तति को उत्तम ज्येष्ठ बनाना है। ८. (शारदौ) = इस प्रकार उत्तम बने हुए युवक और युवति सब बुराइयों को शीर्ण करनेवाले हों। (ऋतू) = नियमित गतिवाले हों। (अभिकल्पमाना) = शरीर व बुद्धि दोनों को समर्थ बनाएँ। अभ्युदय व निःश्रेयस दोनों का साधन करें। ९. (इन्द्रमिव) = इन्द्र की भाँति बने हुए इस व्यक्ति को (देवाः अभिसंविशन्तु) = सब देवता प्राप्त हों । १०. सब देवताओं के समावेश से देव बनकर तया देवतया उस महादेव के साथ, अर्थात् उसकी उपासना करते हुए (अङ्गिरस्वत्) = अङ्ग अङ्ग में रसवाले की भाँति, अर्थात् शक्तिशाली अङ्गोंवाले होते हुए (ध्रुवे सीदतम्) = ध्रुव होकर मर्यादित जीवनवाले होकर घर में विराजो ।
Essence
भावार्थ- पति-पत्नी गतिशील हों। गतिशीलता से शक्तिशाली बनें। शक्ति से सब शत्रुओं को शीर्ण करनेवाले हों। नियमित गतिवाले होकर, प्रभु की उपासना से अङ्ग अङ्ग में रस का सञ्चार करें और ध्रुव होकर घर में निवास करें।
Subject
इष+ ऊर्ज- शरत्