Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 57

58 Mantra
13/57
Devata- प्रजापतिर्देवता Rishi- उशना ऋषिः Chhand- स्वराड्ब्राह्मी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒दमु॑त्त॒रात् स्व॒स्तस्य॒ श्रोत्र॑ꣳ सौ॒वꣳ श॒रछ्रौ॒त्र्युड्टनु॒ष्टुप् शा॑र॒द्यनु॒ष्टुभ॑ऽ ऐ॒डमै॒डान् म॒न्थी म॒न्थिन॑ऽ एकवि॒ꣳशऽ ए॑कवि॒ꣳशाद् वै॑रा॒जं वि॒श्वामि॑त्र॒ऽ ऋषिः॑ प्र॒जाप॑तिगृहीतया॒ त्वया॒ श्रोत्रं॑ गृह्णामि प्र॒जाभ्यः॑॥५७॥

इ॒दम्। उ॒त्त॒रात्। स्व॒रिति॒ स्वः᳖। तस्य॑। श्रोत्र॑म्। सौ॒वम्। श॒रत्। श्रौ॒त्री। अ॒नु॒ष्टुप्। अ॒नु॒स्तुबित्य॑नु॒ऽस्तुप्। शा॒र॒दी। अ॒नु॒ष्टुभः॑। अ॒नु॒स्तुभ॒ इत्य॑नु॒ऽस्तुभः॑। ऐ॒डम्। ऐ॒डात्। म॒न्थी। म॒न्थिनः॑। ए॒क॒वि॒ꣳश इत्ये॑कऽवि॒ꣳशः। ए॒क॒वि॒ꣳशादित्ये॑ऽकवि॒ꣳशात्। वै॒रा॒जम्। वि॒श्वामि॑त्रः। ऋषिः॑। प्र॒जाप॑तिगृहीत॒येति॑ प्र॒जाप॑तिऽगृहीतया। त्वया॑। श्रोत्र॑म्। गृ॒ह्णा॒मि॒। प्र॒जाभ्य॒ इति॑ प्र॒ऽजाभ्यः॑ ॥५७ ॥

Mantra without Swara
इदमुत्तरात्स्वस्तस्य श्रोत्रँ सौवँ शरच्छ्रौत्र्यनुष्टुप्शारद्यनुष्टुभऽऐडमैडान्मन्थी मन्थिनऽएकविँशऽएकविँशाद्वैराजँविश्वामित्रऽऋषिः प्रजापतिगृहीतया त्वया श्रोत्रङ्गृह्णामि प्रजाभ्यः ॥

इदम्। उत्तरात्। स्वरिति स्वः। तस्य। श्रोत्रम्। सौवम्। शरत्। श्रौत्री। अनुष्टुप्। अनुस्तुबित्यनुऽस्तुप्। शारदी। अनुष्टुभः। अनुस्तुभ इत्यनुऽस्तुभः। ऐडम्। ऐडात्। मन्थी। मन्थिनः। एकविꣳश इत्येकऽविꣳशः। एकविꣳशादित्येऽकविꣳशात्। वैराजम्। विश्वामित्रः। ऋषिः। प्रजापतिगृहीतयेति प्रजापतिऽगृहीतया। त्वया। श्रोत्रम्। गृह्णामि। प्रजाभ्य इति प्रऽजाभ्यः॥५७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (इदम्) = यह (उत्तरात्) = उत्तर की ओर (स्व:) = दिशाएँ अधिपति रूपेण हैं। [स्वर्गो हि लोको दिश:- श० ८।१।२।४] । ये दिशाएँ निर्देशों का उपदेशों का प्रतीक हैं-प्रत्येक दिशा एक बोध दे रही है 'प्राची' आगे बढ़ने का तो 'दक्षिणा' - दाक्षिण्य का, ('प्रतीची') = प्रत्याहार का और उदीची [उत्तरा] उन्नति का तथा अन्त में 'ऊर्ध्वा' - सर्वोत्कृष्ट स्थिति का उपदेश कर रही है, अतः २ (तस्य) = उपासक का (श्रोत्रम्) = श्रोत्र (सौवम्) = स्वः का सन्तान होता है इसका श्रोत्र दिशाओं के उपदेश को सुनता है। ३. (श्रौत्री शरत्) = इसके जीवन में श्रोत्र - सुनने की सन्तान शरत् होती है, अर्थात् यह दिशाओं के इन उपदेशों को सुनता हुआ अपने सब पापों को शीर्ण करनेवाला होता है। ४. (शारदी अनुष्टुभः) = पापों की शीर्णता से प्रतिक्षण इसका प्रभु-स्तवन चलता है, अर्थात् इसका प्रभु-स्तवन यही है कि यह बुराइयों को अपने से दूर करता है । ५. (अनुष्टुभः) = अनुक्षण प्रभु-स्तवन से (ऐडम्) = [ इडाया: ज्ञानम्] - इस वेदवाणी का ज्ञान होता है - हृदयदेश में ज्ञान का प्रकाश होता है। (ऐडात्) = इस वाणी के ज्ञान से यह (मन्थी) = मन्थन व चिन्तन करनेवाला बनता है । (मन्थिनः) = इस मन्थन से (एकविंश:) = यह त्रिगुणासप्त [ये त्रिषप्तः] शक्तियोंवाला होता है। ८. (एकविंशात् वैराजम्) = इन इक्कीस शक्तियों से यह विशिष्ट रूप से चमकनेवाला बनता है । ९. यह विशेष रूप से चमकनेवाला (विश्वामित्र ऋषिः) = सबके साथ स्नेह करनेवाला तत्त्वद्रष्टा बनता है। १०. और पत्नी से कहता है कि (प्रजापतिगृहीतया) = प्रजापति का ग्रहण करनेवाली, प्रभु का ध्यान करनेवाली (त्वया) = तेरे साथ (श्रोत्रं गृह्णामि) = मैं इस कान को वश में करता हूँ, प्रजाभ्यः = जिससे हम उत्तम सन्तानों को प्राप्त कर सकें।
Essence
भावार्थ - दिशाओं के उपदेश को सुनते हुए हम श्रोत्र को पूर्णरूप से वश में करके कभी अशुभ का श्रवण न करें, जिससे हमारी सन्तानें उत्तम ही हों।
Subject
दिशाएँ [उत्तरात् स्वः ] श्रोत्र - ग्रहण - विश्वामित्र