Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 41

58 Mantra
13/41
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विरूप ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ॒दि॒त्यं गर्भं॒ पय॑सा॒ सम॑ङ्धि स॒हस्र॑स्य प्रति॒मां वि॒श्वरू॑पम्। परि॑वृङ्धि॒ हर॑सा॒ माभि म॑ꣳस्थाः श॒तायु॑षं कृणुहि ची॒यमा॑नः॥४१॥

आ॒दि॒त्यम्। गर्भ॑म्। पय॑सा। सम्। अ॒ङ्धि॒। स॒हस्र॑स्य। प्र॒ति॒मामिति॑ प्रति॒ऽमाम्। वि॒श्वरू॑प॒मिति॑ वि॒श्वऽरू॑पम्। परि॑। वृ॒ङ्धि॒। हर॑सा। मा। अ॒भि। म॒ꣳस्थाः॒। श॒तायु॑ष॒मिति॑ श॒तऽआ॑युषम्। कृ॒णु॒हि॒। ची॒यमा॑नः ॥४१ ॥

Mantra without Swara
आदित्यङ्गर्भम्पयसा समङ्धि सहस्रस्य प्रतिमाँ विश्वरूपम् । परि वृङ्धि हरसा माभि मँस्थाः शतायुषङ्कृणुहि चीयमानः ॥

आदित्यम्। गर्भम्। पयसा। सम्। अङ्धि। सहस्रस्य। प्रतिमामिति प्रतिऽमाम्। विश्वरूपमिति विश्वऽरूपम्। परि। वृङ्धि। हरसा। मा। अभि। मꣳस्थाः। शतायुषमिति शतऽआयुषम्। कृणुहि। चीयमानः॥४१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र की समाप्ति इस बात पर थी कि 'खूब दें'। दे वही पाता है जो लोभ से ऊपर उठता है। लोभ से ऊपर उठकर ही मनुष्य हृदय को पवित्र बना पाता है। लोभ से शरीर का स्वास्थ्य नष्ट होता है। लोभ से बुद्धि भी नष्ट हो जाती है। इस प्रकार लोभ को छोड़ने से 'शरीर, मन व बुद्धि' सभी की उन्नति होती है। (पयसा) = इस आप्यायन-वर्धन- के द्वारा (आदित्यं गर्भम्) = उस ज्योतिर्मय गर्भवाले 'हिरण्यगर्भ' प्रभु को (समङ्धि) = [समञ्जयसि] तू अपने में व्यक्त करता है, तुझे प्रभु का दर्शन होता है। २. उस प्रभु का जो (सहस्त्रस्य प्रतिमाम्) = आनन्दमयता की मूर्ति हैं अथवा शतशः धनों के दाता हैं [बहुधनप्रद - म० ] और (विश्वरूपम्) = सब रूपों के प्रकाशक हैं। सम्पूर्ण ज्ञानों का निरूपण करनेवाले है, अर्थात् उस प्रभु के दर्शन से [क] जीवन आनन्दमय होगा। [ख] सब आवश्यक धन प्राप्त होंगे तथा [ग] हमारा ज्ञान बढ़ेगा। ३. उस प्रभु के दर्शन के लिए तू [क] (हरसा) = मानस स्वास्थ्य का हरण करनेवाले क्रोध से (परिवृङ्धि) = अपने को बचा [परिवर्जय], अर्थात् सदा क्रोध से बच । [ख] (माभि मंस्थाः) = अभिमान मत कर। अभिमान सारी उन्नति को समाप्त करके हमें प्रभु से दूर ले जाता है। प्रभु का सान्निध्य अहंभाव को समाप्त करनेवाला है। [ग] (चीयमानः) = स्वास्थ्य, सत्य व ज्ञान की वृद्धि करता हुआ तू (शतायुषम्) = पूर्ण आयुष्य का, शत वर्ष के जीवन का (कृणुहि) = सम्पादन कर। सौ वर्ष तक नीरोगता से जीनेवाला बन।
Essence
भावार्थ- प्रभु की भक्ति शरीर, मन व बुद्धि के आप्यायन से होती है। प्रभु प्राप्ति के लिए साधना यह है कि हम क्रोध छोड़ें, अभिमान न करें, और उन्नति करते हुए सौ वर्ष तक जीनेवाले बनें। प्रभु-प्राप्ति होने पर हमें आनन्द प्राप्त हो। इससे अनायास योगक्षेम चलेगा, ज्ञान बढ़ेगा।
Subject
क्रोध व अभिमान का त्याग