Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 34

58 Mantra
13/34
Devata- जातवेदाः देवताः Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- भुरिक् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ध्रु॒वासि॑ ध॒रुणे॒तो ज॑ज्ञे प्र॒थ॒ममे॒भ्यो योनि॑भ्यो॒ऽ अधि॑ जा॒तवे॑दाः। स गा॑य॒त्र्या त्रि॒ष्टुभा॑ऽनु॒ष्टुभा॑ च दे॒वेभ्यो॑ ह॒व्यं व॑हतु प्रजा॒नन्॥३४॥

ध्रु॒वा। अ॒सि॒। ध॒रुणा॑। इ॒तः। ज॒ज्ञे॒। प्र॒थ॒मम्। ए॒भ्यः। योनि॑भ्य॒ इति॒ योनि॑ऽभ्यः। अधि॑। जा॒तवे॑दा॒ इति॑ जा॒तवे॑दाः। सः। गा॒य॒त्र्या। त्रि॒ष्टुभा॑। त्रि॒स्तुभेति॑ त्रि॒ऽस्तुभा॑। अ॒नु॒ष्टुभा॑। अ॒नु॒स्तुभेत्य॑नु॒ऽस्तुभा॑। च॒। दे॒वेभ्यः॑। ह॒व्यम्। व॒ह॒तु॒। प्र॒जा॒नन्निति॑ प्रऽजा॒नन् ॥३४ ॥

Mantra without Swara
धु्रवासि धरुणेतो जज्ञे प्रथममेभ्यो योनिभ्यो अधि जातवेदः । स गायत्र्या त्रिष्टुभानुष्टुभा च देवेभ्यो हव्यँवहतु प्रजानन् ॥

ध्रुवा। असि। धरुणा। इतः। जज्ञे। प्रथमम्। एभ्यः। योनिभ्य इति योनिऽभ्यः। अधि। जातवेदा इति जातवेदाः। सः। गायत्र्या। त्रिष्टुभा। त्रिस्तुभेति त्रिऽस्तुभा। अनुष्टुभा। अनुस्तुभेत्यनुऽस्तुभा। च। देवेभ्यः। हव्यम्। वहतु। प्रजानन्निति प्रऽजानन्॥३४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में प्रभु के कर्मों को देखकर कर्त्तव्य-निर्धारण की बात कही है। वैसा करनेवाली एक गृहिणी के लिए कहते हैं कि (ध्रुवा असि) = तू अपने जीवन में ध्रुव बनती है, मर्यादा से कभी विचलित नहीं होती । २. (धरुणा) = प्रभु की भाँति ही तू घर के सभी सभ्यों का धारण करनेवाली बनती है। ३. (इतः) = इन धारणात्मक कर्मों से (प्रथमं जज्ञे) = सर्वोत्तम विकास को प्राप्त करती है [ progress of the first rank ] । वस्तुतः जीवन का इससे अधिक विकास हो ही क्या सकता है कि हम प्रभु की पद-पद्धति पर प्रयाण करनेवाले बनें। ४. (एभ्यः योनिभ्यः) = इन जन्म-मरण की कारणभूत योनियों से अधि जातवेदाः = वे प्रभु ऊपर स्थित हैं, वे प्रभु अजर व अमर हैं। एक कर्मयोगी भी उस प्रभु की महिमा को जानता हुआ पुण्यकर्मा बनकर, जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठ जाता है। एक गृहिणी भी इसी प्रकार धारणात्मक कर्मों में लगी हुई उस प्रभु को पाती है। ५. पति के लिए कहते हैं कि (सः) = वह (गायत्र्या) = [ गयाः प्राणाः तान् तत्रे] प्राणशक्ति की रक्षा के साथ, (त्रिष्टुभा) = 'काम-क्रोध-लोभ' इन तीनों के रोकने के साथ तथा अनुष्टुभा प्रतिक्षण प्रभु का स्मरण करने के साथ (देवेभ्यः) = विद्वानों से (हव्यम्) = ग्रहणीय ज्ञान को वहतु धारण करे और इस प्रकार (प्रजानन्) = प्रकृष्ट ज्ञानवाला हो। (देवेभ्यः हव्यं वहतु) = इस वाक्य का यह अर्थ भी हो सकता है कि दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए सदा हव्य को धारण करे, अर्थात् पवित्र पदार्थों को ही खाये और साथ ही दानपूर्वक बचे हुए को ही खानेवाला बने। यह वह मार्ग है जिसपर चलकर जीव भी प्रभु की भाँति इन योनियों से ऊपर उठ जाता है, अर्थात् जन्म-मरण के चक्र में नहीं फँसता ।
Essence
भावार्थ -पत्नी ध्रुवा व धरुणा हो । पति हव्य का सेवन करनेवाला हो ।
Subject
पत्नी व पति की विशेषताएँ