Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 29

58 Mantra
13/29
Devata- विश्वेदेवा देवताः Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मधु॑मान्नो॒ वन॒स्पति॒र्मधु॑माँ२ऽ अस्तु॒ सूर्य्यः॑। माध्वी॒र्गावो॑ भवन्तु नः॥२९॥

मधु॑मा॒निति॒ मधु॑ऽमान्। नः॒। वन॒स्पतिः॑। मधु॑मा॒निति॒ मधु॑ऽमान्। अ॒स्तु॒। सूर्य्यः॑। माध्वीः॑। गावः॑। भ॒व॒न्तु॒। नः॒ ॥२९ ॥

Mantra without Swara
मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावो भवन्तु नः ॥

मधुमानिति मधुऽमान्। नः। वनस्पतिः। मधुमानिति मधुऽमान्। अस्तु। सूर्य्यः। माध्वीः। गावः। भवन्तु। नः॥२९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र के अनुसार अपना सुन्दर जीवन बनानेवाले व्यक्ति ही 'ऋतायन्' हैं, (ऋतम् आत्मन इछन्ति) = जो अपने जीवन में सब क्रियाएँ ऋत के अनुसार करते हैं। (ऋत) = right= ठीक, उनकी सब क्रियाएँ ठीक स्थान व ठीक समय पर ही होती हैं। ऋत का अर्थ यज्ञ भी है। इनका जीवन यज्ञिय होता है। ये लोग स्वार्थ से ऊपर उठकर यज्ञमय जीवनवाले बनते हैं, सर्वभूतहिते रतः होते हैं । २. इस (ऋतायते) = ऋतमय जीवनवाले के लिए (वाता:) = वायुएँ मधु-मधुर होकर बहती हैं, हानिकर नहीं होती । (सिन्धवः) = नदियाँ भी इसके लिए (मधु) = मधुर बनकर (क्षरन्ति) = चलती हैं। इसके लिए नदियों का जल सदा स्वास्थ्यवर्धक ही होता है। (नः) = हम ऋत का पालन करनेवालों के लिए (ओषधी:) = ओषधियाँ (माध्वी:) = माधुर्यवाली (सन्तु) = हों। ३. मन्त्र में यह क्रम द्रष्टव्य है कि वर्षा की वायुएँ चलती हैं, नदियाँ बहती हैं और ओषधियाँ उत्तम होती हैं। ४. (नक्तं मधु) = रात्रि इसके लिए माधुर्यवाली हो (उत) = और (उषसः) = उषःकाल भी मधुर हों। रात्रि में यह मीठी नींद सोये, (उषः) = इसके सब दोषों का दहन करती हुई इसे प्राणशक्ति सम्पन्न बना दे। ५. (पार्थिवं रजः) = यह पार्थिवलोक या पृथिवी की मिट्टी इसके लिए (मधुमत्) = माधुर्यवाली हो। इसके शरीर पर मलने से इसके सब विष दूर हों पिता (द्यौ:) = पितृतुल्य यह द्युलोक (नः) = हमारे लिए (मधुः अस्तु) = माधुर्यवाला हो। पृथिवी माता हो और द्युलोक पिता। माता-पिता की भाँति ये (ऋतायन्) = के लिए हितकारी हों । संक्षेप में दिन-रात तथा पृथिवी व द्युलोक सब इसके लिए हितकारी हों । ६. (नः) = हमारे लिए (वनस्पतिः) = सब वनस्पतियाँ मधुमान् माधुर्य को लिये हुए हों, (सूर्यः मधुमान् अस्तु) = सूर्य माधुर्यवाला हो। (गावः) = गौवें भी (नः) = हमारे लिए (माध्वी:) = माधुर्यपूर्ण दूध देनेवाली (भवन्तु) = हों। वस्तुतः सूर्य किरणों से वनस्पतियाँ भी प्राणशक्ति सम्पन्न होती हैं और उनका सेवन करनेवाली गौवें भी उत्तम दूध देनेवाली होती हैं । ७. एवं हमारा जीवन ऋतमय हो तो सारा ही आधिदैविक जगत् हमारे अनुकूल होता है, हमारे लिए मधुर होता है। जीवन में से ऋत के चले जाने पर ही आधिदैविक कष्ट आया करते हैं।
Essence
भावार्थ- हमारा जीवन ऋतमय हो, जिससे हमारा संसार मधुर बने। ऋतमय जीवनवाला ही गोतम, प्रशस्तेन्द्रिय होता है। ऐसा होने पर ही इन्द्र की कृपा होती है।
Subject
मधुर-ही-मधुर