Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 25

58 Mantra
13/25
Devata- ऋतवो देवताः Rishi- इन्द्राग्नी ऋषी Chhand- भुरिगतिजगती, भुरिग्ब्राही बृहती Swara- निषादः, मध्यमः
Mantra with Swara
मधु॑श्च॒ माध॑वश्च॒ वास॑न्तिकावृ॒तूऽ अ॒ग्नेर॑न्तः श्ले॒षोऽसि॒ कल्पे॑तां॒ द्यावा॑पृथि॒वी कल्॑पन्ता॒माप॒ऽ ओष॑धयः॒ कल्प॑न्ताम॒ग्नयः॒ पृथ॒ङ् मम॒ ज्यैष्ठ्या॑य॒ सव्र॑ताः। येऽ अ॒ग्नयः॒ सम॑नसोऽन्त॒रा द्यावा॑पृथि॒वीऽ इ॒मे। वास॑न्तिकावृ॒तूऽ अ॑भि॒कल्प॑माना॒ऽ इन्द्र॑मिव दे॒वाऽ अ॑भि॒संवि॑शन्तु॒ तया॑ दे॒वत॑याङ्गिर॒स्वद् ध्रु॒वे सी॑दतम्॥२५॥

मधुः॑। च॒। माध॑वः। च॒। वास॑न्तिकौ। ऋ॒तूऽइत्यृ॒तू। अ॒ग्नेः। अ॒न्तः॒श्ले॒ष इत्य॑न्तःऽश्ले॒षः। अ॒सि॒। कल्पे॑ताम्। द्यावा॑पृथि॒वीऽइति॒ द्यावा॑पृथि॒वी। कल्प॑न्ताम्। आपः॑। ओष॑धयः। कल्प॑न्ताम्। अ॒ग्नयः॑। पृथ॑क्। मम॑। ज्यैष्ठ्या॑य। सव्र॑ता इति॒ सऽव्र॑ताः। ये। अ॒ग्नयः॑। सम॑नस॒ इति॒ सऽम॑नसः। अ॒न्त॒रा। द्यावा॑पृथि॒वीऽइति॒ द्यावा॑पृथि॒वी। इ॒मेऽइती॒मे। वास॑न्तिकौ। ऋ॒तूऽइत्यृ॒तू। अ॒भि॒कल्प॑माना॒ इत्य॑भि॒ऽकल्प॑मानाः। इन्द्र॑मि॒वेतीन्द्र॑म्ऽइव। दे॒वाः। अ॒भि॒संवि॑श॒न्त्वित्य॑भि॒ऽसंवि॑शन्तु। तया॑। दे॒वत॑या। अ॒ङ्गिर॒स्वत्। ध्रु॒वेऽइति॑ ध्रु॒वे। सी॒द॒त॒म् ॥२५ ॥

Mantra without Swara
मधुश्च माधवश्च वासन्तिकावृतूऽअग्नेरन्तःश्लेषोसि कल्पेतान्द्यावापृथिवी कल्पन्तामापऽओषधयः कल्पन्तामग्नयः पृथङ्मम ज्यैष्ठ्याय सव्रताः । येऽअग्नयः समनसोन्तरा द्यावापृथिवीऽइमे वासन्तिकावृतूऽअभिकल्पमानाऽइन्द्रमिव देवा अभिसँविशन्तु तया देवतयाङ्गिरस्वद्धरुवे सीदतम् ॥

मधुः। च। माधवः। च। वासन्तिकौ। ऋतूऽइत्यृतू। अग्नेः। अन्तःश्लेष इत्यन्तःऽश्लेषः। असि। कल्पेताम्। द्यावापृथिवीऽइति द्यावापृथिवी। कल्पन्ताम्। आपः। ओषधयः। कल्पन्ताम्। अग्नयः। पृथक्। मम। ज्यैष्ठ्याय। सव्रता इति सऽव्रताः। ये। अग्नयः। समनस इति सऽमनसः। अन्तरा। द्यावापृथिवीऽइति द्यावापृथिवी। इमेऽइतीमे। वासन्तिकौ। ऋतूऽइत्यृतू। अभिकल्पमाना इत्यभिऽकल्पमानाः। इन्द्रमिवेतीन्द्रम्ऽइव। देवाः। अभिसंविशन्त्वित्यभिऽसंविशन्तु। तया। देवतया। अङ्गिरस्वत्। ध्रुवेऽइति ध्रुवे। सीदतम्॥२५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. 'इन्द्राग्नी' ऋषि का यह अन्तिम मन्त्र है। पत्नी ने अत्यन्त मधुर स्वभाववाला बनना है, अतः उसे यहाँ 'मधुः' कहा गया है। पति ने सदा गृहस्थ सञ्चालन के लिए धनार्जन करनेवाला होना है, अतः उसे 'माधव' = लक्ष्मी का पति कहा गया है। जिस समय ये पति - पत्नी ('मधुः च माधवः च') = मधुर स्वभाव और लक्ष्मीपति बनते हैं, उस समय ये (वासन्तिकौ) = एक-दूसरे के समीप उत्तमता से निवास करनेवाले होते हैं। इनका परस्पर प्रेम ठीक बना रहता है। २. (ऋतू) = [ऋ गतौ] ये दोनों अपने कार्यों को बड़े नियम से करनेवाले होते हैं। ऋतुओं की भाँति इनके कार्य समय पर होते हैं। ३. पति के लिए कहते हैं कि तू (अग्ने:) = उस अग्रेणी प्रभु का (अन्तः) = हृदय में (श्लेषः) = आलिङ्गन करनेवाला है। उस प्रभु को तू कभी विस्मृत नहीं करता। तेरी प्रार्थना यही हो कि ४. (द्यावापृथिवी) = मेरा मस्तिष्क व शरीर दोनों ही (कल्पेताम्) = शक्तिशाली बनें, सामर्थ्यवाले हों। मस्तिष्क ज्ञान की ज्योति से उज्ज्वल हो तथा शरीर दृढ़ हो । ५. (आपः ओषधयः) = जल और ओषधियाँ (कल्पन्ताम्) = मुझे शक्तिशाली बनाएँ। पीने के लिए पानी हो, भोजन के लिए वनस्पतियाँ यह सीधा-सादा भोजन मेरे शरीर को नीरोग बनाकर शक्तियुक्त करे। ६. (अग्नयः) = दक्षिणाग्निरूप माता, गार्हपत्याग्निरूप पिता, आहवनीयाग्निरूप आचार्य' ये सब (पृथक्) = अलग-अलग, ५ वर्ष तक माता, ८ वर्ष तक पिता, २५ वर्ष तक आचार्य (कल्पन्ताम्) = मुझे शक्तिशाली बनानेवाले हों । ७. ये तीनों ही (मम) = मेरे (ज्यैष्ठ्याय) = बड़प्पन व उत्कर्ष के लिए (सव्रता:) = समान व्रतवाले हों। माता-पिता व आचार्य इन सबका एक ही कार्य व उद्देश्य हो कि हमें बालकों व युवकों के जीवन को बड़ा सुन्दर बनाना है । ८. (इमे द्यावापृथिवी अन्तरा) = इन द्युलोक व पृथिवीलोक के मध्य में, अर्थात् इस संसार में ये (अग्नयः) = जो भी माता-पिता व आचार्यरूप अग्नियाँ हैं वे (समनसः) = समान मनवाले हों, सन्तानों का उत्तम निर्माण ही इनका उद्देश्य हो । ९. इन अग्नियों से सुन्दर जीवनवाले ये पति-पत्नी (वासन्तिकौ) = परस्पर उत्तम निवासवाले हों (ऋतू) = बड़े नियमित व व्यवस्थित जीवनवाले हों। अभिकल्पमाना ये अपने को दोनों ओर शक्तिशाली बनाएँ, शरीर को दृढ़ व मस्तिष्क को उज्ज्वल । १०. (इन्द्रमिव) = देवराट् इन्द्र को जैसे देव प्राप्त होते हैं उसी प्रकार इस जितेन्द्रिय पति को (देवः) = सब दिव्य गुण (अभिसंविशन्तु) = प्राप्त हों। इसमें दिव्य गुणों का प्रवेश हो । ११. हे पति-पत्नि ! तुम दोनों (तया देवतया) = सदा उस प्रभु स्मरण के साथ कार्य करने से (अङ्गिरस्वत्) = अङ्ग अङ्ग में प्राणशक्ति के सञ्चारवाले की भाँति ध्रुवे मर्यादित जीवनवाले होकर स्थिरता से (सीदतम्) = ठहरो ।
Essence
भावार्थ- पति-पत्नी १. मधु माधव हों, २.वासन्तिक हों, ३. ऋतु हों, ४. हृदय में प्रभु का आलिङ्गन करनेवाले हों, ५. शरीर व मस्तिष्क को सशक्त बनाएँ, ६. जलों व वनस्पतियों का ही सेवन करें, ७. उत्तम माता-पिता व आचार्यवाले हों, ८. इनके माता-पिता व आचार्य का ध्येय इन्हें ज्येष्ठ बनाना हो, ९. वस्तुत: सब माता-पिता व आचार्य परस्पर एक मनवाले होकर इनका निर्माण करें, १०. इन्द्र बनकर दिव्य गुणों को प्राप्त करें, ११. उस प्रभु का स्मरण करते हुए मर्यादित जीवनवाले हों।
Subject
मधु+माधव