Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 16

58 Mantra
13/16
Devata- अग्निर्देवता Rishi- त्रिशिरा ऋषिः Chhand- स्वराडार्ष्यनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ध्रु॒वासि॑ ध॒रुणास्तृ॑ता वि॒श्वक॑र्मणा। मा त्वा॑ समु॒द्रऽ उद्व॑धी॒न्मा सु॑प॒र्णोऽअव्य॑थमाना पृथि॒वीं दृ॑ꣳह॥१६॥

ध्रु॒वा। अ॒सि॒। ध॒रुणा॑। आस्तृ॒तेत्याऽस्तृ॑ता। वि॒श्वक॑र्म॒णेति॑ वि॒श्वऽक॑र्मणा। मा। त्वा॒। स॒मु॒द्रः। उत्। व॒धी॒त्। मा। सु॒प॒र्ण इति॑ सुऽप॒र्णः। अव्य॑थमाना। पृ॒थि॒वीम्। दृ॒ꣳह॒ ॥१६ ॥

Mantra without Swara
धु्रवासि धरुणास्तृता विश्वकर्मणा । मा त्वा समुद्र उद्बधीन्मा सुपर्णा व्यथमाना पृथिवीन्दृँह ॥

ध्रुवा। असि। धरुणा। आस्तृतेत्याऽस्तृता। विश्वकर्मणेति विश्वऽकर्मणा। मा। त्वा। समुद्रः। उत्। वधीत्। मा। सुपर्ण इति सुऽपर्णः। अव्यथमाना। पृथिवीम्। दृꣳह॥१६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. स्त्री भी खूब उन्नत जीवनवाली हो। कैसी ? (ध्रुवा असि) = तू घर में ध्रुव होकर रहनेवाली है। छोटी-छोटी बातों से रूठकर पितृगृह की ओर जानेवाली नहीं। साथ ही अपने जीवन की मर्यादाओं में स्थिरता से रहनेवाली है। २. (धरुणा) = घर में रहती हुई सबका धारण करनेवाली है। अन्न-वस्त्र आदि सब धारणात्मक वस्तुओं का पूर्णतया ध्यान करनेवाली है। ३. (विश्वकर्मणा) = गृह-सम्बन्धी सब कार्यों से तू (आस्तृता) = आच्छादित है, अर्थात् तू सदा घर के कार्यों में लगी रहती है, इसीलिए तो तेरे समीप पाप नहीं आ पाता, क्योंकि इसका मन तो घर के कार्यों में लगा है। ४. इस प्रकार कर्मों में लगा होने के कारण इसका जीवन वासनामय नहीं बनता, अतः मन्त्र में कहते हैं कि (समुद्रः) = [ स मुद्] सदा मौज की मनोवृत्ति में रहनेवाला, मज़े उड़ानेवाला, जिसके दृष्टिकोण में संसार केवल मौज के लिए बना है, ऐसा जार [छैला] पुरुष (त्वा) = तुझे (मा) = मत (उद्बधीत्) = धर्म मार्ग से बाहर करनेवाला हो हो [ उत्=out, हन्-गति ] । (सुपर्ण:) = जैसे एक सुन्दर पंखोंवाला पक्षी होता है, इसी प्रकार चमक-दमकवाले कपड़े पहनकर घूमनेवाला व्यक्ति मा मत विचलित करनेवाला हो। तू इन समुद्रों और (सुपर्णी-बांके) = छैलछबीले व्यक्तियों के पाश में फँसनेवाली न हो। ५. (अव्यथमाना) = भय से विचलित न होती हुई तू (पृथिवीं दृंह) = अपने शरीर को दृढ़ बना । तेरे दृढ़ शरीर के साथ वे खिलवाड़ न कर सकेंगे।
Essence
भावार्थ -पत्नी ध्रुव हो, धरुण हो, कर्मों में लगी हो, बांके - छैले युवकों का शिकार न हो जाए । अविचलित होती हुई अपने शरीर को दृढ़ बनाये ।
Subject
पत्नी भी त्रिशिरा: हो, समुद्र व सुपर्ण