Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 14

58 Mantra
13/14
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्मू॒र्द्धा दि॒वः क॒कुत्पतिः॑ पृथि॒व्याऽ अ॒यम्। अ॒पा रेता॑सि जिन्वति। इन्द्र॑स्य॒ त्वौज॑सा सादयामि॥१४॥

अ॒ग्निः। मू॒र्द्धा। दि॒वः। क॒कुत्। पतिः॑। पृ॒थि॒व्याः। अ॒यम्। अ॒पाम्। रेता॑सि। जि॒न्व॒ति॒। इन्द्र॑स्य। त्वा॒। ओज॑सा। सा॒द॒या॒मि॒ ॥१४ ॥

Mantra without Swara
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपाँ रेताँसि जिन्वति । इन्द्रस्य त्वौजसा सादयामि ॥

अग्निः। मूर्द्धा। दिवः। ककुत्। पतिः। पृथिव्याः। अयम्। अपाम्। रेतासि। जिन्वति। इन्द्रस्य। त्वा। ओजसा। सादयामि॥१४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्रों के अनुसार राष्ट्र-व्यवस्था के उत्तम होने पर प्रत्येक पुरुष को चाहिए कि वह अपने अन्दर दिव्य गुणों को उपजाने के लिए यत्नशील हो। वह कैसा बने ? इसका उल्लेख करते हुए कहते हैं कि (अग्निः) = यह अग्रेणी हो, निरन्तर उन्नति पथ पर आगे बढ़नेवाला हो। २. यह उन्नति करते-करते (मूर्धा) = शिखर पर पहुँचने का प्रयत्न करे। 'आरोहणमाक्रमणम्' ऊपर चढ़ना, ऊपर उठना ही हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। ३. (दिवः ककुत्) = ज्ञान से यह महान् बनता है [ ककुत्-महान्] । ज्ञान को प्राप्त करते हुए यह ऊँचा और ऊँचा उठता चलता है। ४. ज्ञान-प्राप्ति के साथ (अयम्) = यह (पृथिव्याः) = शरीर का (पतिः) = रक्षक बनता है। शरीर के स्वास्थ्य का भी यह पूरा ध्यान रखता है। वस्तुतः सब उन्नतियों का आधार यह शारीरिक स्वास्थ्य ही है। ५. शरीर का पति यह क्यों न बने ? यह तो (अपां रेतांसि) = जल-सम्बन्धी रेतस् का (जिन्वति) = [पुष्णाति -म० ] पोषण करता है। 'आपो रेतो भूत्वा = जल शरीर में रेतस् के रूप में रहते हैं। यह वामदेव इन रेतःकणों का पोषण करता है, उन्हें विनष्ट नहीं होने देता । ६. इस रेतस् का पोषण करनेवाले वामदेव से प्रभु कहते हैं कि (त्वा) = तुझे (इन्द्रस्य ओजसा) = इन्द्र के ओज से (सादयामि) = इस शरीर में स्थापित करता हूँ। इन रेत: कणों की रक्षा से इन्द्रशक्ति का विकास होता है।
Essence
भावार्थ- हम आगे बढ़ें, शिखर तक पहुँचें, ज्ञान से महान् बनें, शरीर के स्वास्थ्य की रक्षा करें और इस प्रकार इन्द्रशक्ति के विकास के लिए रेतःकणों का अपने में पोषण करें।
Subject
शिखर पर