Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 13

58 Mantra
13/13
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- निचृदार्ष्यनुस्टुप् Swara- निषादः
Mantra with Swara
ऊ॒र्ध्वो भ॑व॒ प्रति॑वि॒ध्याध्य॒स्मदा॒विष्कृ॑णुष्व॒ दैव्या॑न्यग्ने। अव॑ स्थि॒रा त॑नुहि यातु॒जूनां॑ जा॒मिमजा॑मिं॒ प्रमृ॑णीहि॒ शत्रू॑न्। अ॒ग्नेष्ट्वा॒ तेज॑सा सादयामि॥१३॥

ऊ॒र्ध्वः। भ॒व॒। प्रति॑। वि॒ध्य॒। अधि॑। अ॒स्मत्। आ॒विः। कृ॒णु॒ष्व॒। दैव्या॑नि। अ॒ग्ने॒। अव॑। स्थि॒रा। त॒नु॒हि॒। या॒तु॒जूना॒मिति॑ यातु॒ऽजूना॑म्। जा॒मिम्। अजा॑मिम्। प्र। मृ॒णी॒हि॒। शत्रू॑न्। अ॒ग्नेः। त्वा॒। तेज॑सा। सा॒द॒या॒मि॒ ॥१३ ॥

Mantra without Swara
ऊर्ध्वा भव प्रति विध्याध्यस्मदाविष्कृणुष्व दैव्यान्यग्ने । अव स्थिरा तनुहि यातुजूनाञ्जामिमजामिम्प्र मृणीहि शत्रून् । अग्नेष्ट्वा तेजसा सादयामि ॥

ऊर्ध्वः। भव। प्रति। विध्य। अधि। अस्मत्। आविः। कृणुष्व। दैव्यानि। अग्ने। अव। स्थिरा। तनुहि। यातुजूनामिति यातुऽजूनाम्। जामिम्। अजामिम्। प्र। मृणीहि। शत्रून्। अग्नेः। त्वा। तेजसा। सादयामि॥१३॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र की भावना को ही पुनः दुहराते हैं कि (अग्ने ऊर्ध्वः भव) = हे आलस्य को छोड़कर उठ खड़ा हो। तुझे सदा 'जागृवि' बनना है-जागना है। २.राजन् ! तू (प्रतिविध्य) = तू एक-एक शत्रु को बींध डाल। शत्रुओं को विद्ध करना ही तेरा मौलिक कर्त्तव्य है । ३. (अध्यस्मत्) = हमारे उद्देश्य से, हमारे कल्याण के लिए (दैव्यानि) = दिव्य कर्मों को (आविष्कृणुष्व) = प्रकट कर। तू इस प्रकार अद्भुत कर्मों को करनेवाला बन कि हमारा कल्याण-ही-कल्याण सिद्ध हो। ४. (यातुजूनाम्) = पीड़ा के लिए ही जिनकी गति है [ यातु +जु], अर्थात् जिनके कर्म औरों को पीड़ित करने के लिए ही होते हैं, उन यातुधानों-राक्षसों के (स्थिरा) = दृढ़ धनुषादि अस्त्रों को भी अवतनुहि ढीला कर दे। ५. (जामिम् अजामिम्) = रिश्तेदार हो, गैर रिश्तेदार हो सभी शत्रून् शत्रुओं को (प्रमृणीहि) = कुचल डाल । जो भी राष्ट्र का शत्रु है उसे समाप्त करना ही है । ६ (त्वा) = तुझे (अग्नेः) = अग्नि के तेजसा तेज के साथ सादयामि इस सिंहासन पर बिठाता हूँ। जैसे अग्नि सब मलों को भस्म कर देती है, उसी प्रकार राजा को भी राष्ट्र के सब शत्रुओं को भस्म करना है।
Essence
भावार्थ - राजा राष्ट्र के सब शत्रुओं का विध्वंस करके राष्ट्र का उत्थान करनेवाला बने । दण्ड- व्यवस्था में सम्बन्ध का विचार न करके न्याय मार्ग से ही दण्ड देना चाहिए।
Subject
वेधन - मारण