Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 12

58 Mantra
13/12
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- भुरिगार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उद॑ग्ने तिष्ठ॒ प्रत्यात॑नुष्व॒ न्यमित्राँ॑२ऽ ओषतात् तिग्महेते। यो नो॒ऽ अरा॑तिꣳ समिधान च॒क्रे नी॒चा तं ध॑क्ष्यत॒सं न शुष्क॑म्॥१२॥

उत्। अ॒ग्ने॒। ति॒ष्ठ॒। प्रति॑। आ। त॒नु॒ष्व॒। नि। अ॒मित्रा॑न्। ओ॒ष॒ता॒त्। ति॒ग्म॒हे॒त॒ इति॑ तिग्मऽहेते। यः। नः॒। अरा॑तिम्। स॒मि॒धा॒नेति॑ सम्ऽइधान। च॒क्रे। नी॒चा। तम्। ध॒क्षि॒। अ॒त॒सम्। न। शुष्क॑म् ॥१२ ॥

Mantra without Swara
उदग्ने तिष्ठ प्रत्या तनुष्व न्यमित्राँऽ ओषतात्तिग्महेते । यो नो अरातिँ समिधान चक्रे नीचा तन्धक्ष्यतसन्न शुष्कम् ॥

उत्। अग्ने। तिष्ठ। प्रति। आ। तनुष्व। नि। अमित्रान्। ओषतात्। तिग्महेत इति तिग्मऽहेते। यः। नः। अरातिम्। समिधानेति सम्ऽइधान। चक्रे। नीचा। तम्। धक्षि। अतसम्। न। शुष्कम्॥१२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र के ही विषय को इस रूप में कहते हैं कि (अग्ने उत् तिष्ठ) = हे राजन्! तू ऊपर उठ । आलस्य को छोड़कर प्रजा-रक्षण के कार्य के लिए उद्यत हो जा। अथवा हे राजन्! तू विषयों से ऊपर उठ । अपने महान् उत्तरदायित्व को समझ । २. (प्रति आतनुष्व) = एक-एक शत्रु के प्रति अपने शस्त्र को विस्तृत कर। ३. हे (तिग्महेते) = तीव्र अस्त्रोंवाले राजन् ! तू (अमित्रान्) = शत्रुओं को (नि ओषतात्) = निश्चय से जलानेवाला हो। तेरे शस्त्रों की अग्नि में शत्रु दग्ध हो जाए। ४. हे (समिधान) = शक्ति से दीप्यमान राजन् ! (यः) = जो भी (नः) = हमारे साथ अरातिम् शत्रुता चक्रे करता है, अर्थात् जो भी हमारा शत्रु है (तम्) = उसे (नीचा धक्षि) = [ burn to the ground] भस्म करके भूमिगत कर दीजिए, जलाकर मिट्टी में मिला दीजिए। न जिस प्रकार (शुष्कं अतसम्) = [ a garment made of the fibre of flax ] सूखे सन के बने कपड़े को जला देते हैं।
Essence
भावार्थ - राजा प्रजा के शत्रुओं का दहन करता हुआ प्रजा को उन्नति का सु-अवसर प्राप्त कराए।
Subject
शत्रु-दहन