Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 86

117 Mantra
12/86
Devata- वैद्यो देवता Rishi- भिषगृषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यस्यौ॑षधीः प्र॒सर्प॒थाङ्ग॑मङ्गं॒ परु॑ष्परुः। ततो॒ यक्ष्मं॒ विबा॑धध्वऽउ॒ग्रो म॑ध्यम॒शीरि॑व॥८६॥

यस्य॑। ओष॑धीः। प्र॒सर्प॒थेति॑ प्र॒ऽसर्प॑थ। अङ्ग॑मङ्ग॒मित्यङ्ग॑म्ऽअङ्गम्। प॑रुष्परुः। परुः॑परु॒रिति॒ परुः॑ऽपरुः। ततः॑। यक्ष्म॑म्। वि। बा॒ध॒ध्वे॒। उ॒ग्रः। म॒ध्य॒म॒शीरि॒वेति॑ मध्यम॒शीःऽइ॑व ॥८६ ॥

Mantra without Swara
यस्यौषधीः प्रसर्पथाङ्गम्ङ्गम्परुष्परुः । ततो यक्ष्मँ वि बाधध्व उग्रो मध्यमशीरिव ॥

यस्य। ओषधीः। प्रसर्पथेति प्रऽसर्पथ। अङ्गमङ्गमित्यङ्गम्ऽअङ्गम्। परुष्परुः। परुःपरुरिति परुःऽपरुः। ततः। यक्ष्मम्। वि। बाधध्वे। उग्रः। मध्यमशीरिवेति मध्यमशीःऽइव॥८६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. वैद्य ओषधियों को सम्बोधित करके कहता है कि (ओषधी:) = हे ओषधियो ! तुम (यस्य) = जिस रोगी के (अङ्ग अङ्ग) = अङ्ग अङ्ग में (परुष्परुः) = और पर्व पर्व में (प्रसर्पथ) = जाती हो या व्याप्त होती हो (ततः) = उस-उस अङ्ग व पर्व से उस रोगी के (यक्ष्मम्) = रोग को (विबाधध्वे) = बाधित करती हो, अर्थात् उस अङ्ग व पर्वसमुदाय से व्याधि को दूर करती हो । २. ओषधियों द्वारा रोगों के बाधन का दृष्टान्त देते हुए कहते हैं कि (उग्रः) = गोधा व अंगुलित्राण को बाँधे हुए क्षत्रिय (इव) = जैसे (मध्यमशी:) = [ देहमध्ये भवं मध्यमं मर्मभागं शृणाति हिनस्ति ] देहमध्य में होनेवाले मर्मभाग को हिंसित करता है। मर्मघातक क्षत्रिय जैसे दुष्ट के लिए भयंकर होता है, उसी प्रकार ये ओषधियाँ रोगों के लिए भयंकर होती हैं। उग्र क्षत्रिय जैसे शत्रु के दो टुकड़े कर डालता है, इसी प्रकार यह ओषधि रोग के टुकड़े कर डालती है।
Essence
भावार्थ - एक सद्वैद्य से दी गई उत्तम ओषधि रोगरूप शत्रु को इस प्रकार नष्ट कर देती है जैसे कि उग्र क्षत्रिय से प्रयुक्त अस्त्र शत्रु को मार डालता है।
Subject
यक्ष्म-विबाधन [रोग- भङ्ग]