Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 85

117 Mantra
12/85
Devata- वैद्यो देवता Rishi- भिषगृषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यदि॒मा वा॒जय॑न्न॒हमोष॑धी॒र्हस्त॑ऽआद॒धे। आ॒त्मा यक्ष्म॑स्य नश्यति पु॒रा जी॑व॒गृभो॑ यथा॥८५॥

यत्। इ॒माः। वा॒जय॑न्। अ॒हम्। ओष॑धीः। हस्ते॑। आ॒द॒ध इत्या॑ऽद॒धे। आ॒त्मा। यक्ष्म॑स्य। न॒श्य॒ति॒। पु॒रा। जी॒व॒गृभ॒ इति॑ जीव॒ऽगृभः॑। य॒था॒ ॥८५ ॥

Mantra without Swara
यदिमा वाजयन्नहमोषधीर्हस्तऽआदधे । आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो यथा ॥

यत्। इमाः। वाजयन्। अहम्। ओषधीः। हस्ते। आदध इत्याऽदधे। आत्मा। यक्ष्मस्य। नश्यति। पुरा। जीवगृभ इति जीवऽगृभः। यथा॥८५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. 'ओषधियाँ रोग को धमकाकर भगा देती हैं', गत मन्त्र की इसी बात को और भी सुन्दर रूप में इस प्रकार कहते हैं कि (यत्) = ज्यों ही (वाजयन्) = रोगी को शक्तिशाली बनाता हुआ [बनाने की कामनावाला] मैं वैद्य (इमाः ओषधीः) = इन ओषधियों को (हस्ते) = हाथ में (आदधे) = धारण करता हूँ त्यों ही (यक्ष्मस्य) = रोग का (आत्मा) = स्वरूप (नश्यति) = नष्ट हो जाता है । औषध को खाने से पहले ही रोग नष्ट होने लगता है, खाने पर तो उसने बचना ही क्या है? २. यह वर्णन निःसन्देह काव्यात्मक है, इसमें अतिशयोक्ति अलंकार दिखता है, परन्तु इसमें बहुत कुछ सत्यता भी है। रोगी के मन पर वैद्य की महिमा, उसके प्रति विश्वास से उत्तम प्रभाव पड़ने से वह अपने को स्वस्थ होता हुआ अनुभव करता है। रोगी को जब वैद्य कहता है कि 'मा बिभेः न मरिष्यसि ' = ' डरता क्यों है, तू मरेगा नहीं। मैं अभी तेरे रोग को मारे डालता हूँ' हृदय में ऐसा विश्वास बैठने पर रोगी अपने को अच्छा अनुभव क्यों न करेगा ? ३. उपमा से इसी बात को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि (यथा) = जैसे (जीवगृभः) =[जीवन् सन्नेव यो हिंसार्थं गृह्यते स जीवगृप् तस्य] कोई व्यक्ति जीवित ही फाँसी दिये जाने के लिए पकड़ लिया जाता है और वधस्थली की ओर ले जाया जाता है तो उस जीवगृभ् के प्राण अतिविषाद के कारण - 'मैं अब मरा' इस प्रकार सोचने के कारण पुरा = फाँसी देने से पहले ही नष्टप्राय हो जाते हैं उसी प्रकार ओषधि के वैद्य के हाथ में धारण करते ही रोग को अपनी मृत्यु दिखने लगती है और रोग की आत्मा नष्ट हो जाती है। रोग का ज़ोर नहीं रहता, यही यक्ष्म की आत्मा का नाश है।
Essence
भावार्थ- सद्वैद्य आया, उसने औषध हाथ में पकड़ी और रोगी का रोग भागा। सद्वैद्य वही है जो रोगी की आत्मा को जिलाकर रोग की आत्मा को मार देता है।
Subject
यक्ष्म के आत्मा का नाश