Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 72

117 Mantra
12/72
Devata- मित्रादयो लिङ्गोक्ता देवताः Rishi- कुमारहारित ऋषिः Chhand- आर्ची पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
कामं॑ कामदुघे धुक्ष्व मि॒त्राय॒ वरु॑णाय च। इन्द्रा॑या॒श्विभ्यां॑ पू॒ष्णे प्र॒जाभ्य॒ऽओष॑धीभ्यः॥७२॥

काम॑म्। का॒म॒दु॒घ॒ इति॑ कामऽदुघे। धु॒क्ष्व॒। मि॒त्राय॑। वरु॑णाय। च॒। इन्द्रा॑य। अ॒श्विभ्या॒मित्य॒श्विऽभ्या॑म्। पू॒ष्णे। प्र॒जाभ्य॒ इति॑ प्र॒जाऽभ्यः॑। ओष॑धीभ्यः ॥७२ ॥

Mantra without Swara
कामङ्कामदुघे धुक्ष्व मित्राय वरुणाय च । इन्द्रायाश्विभ्यां पूष्णे प्रजाभ्यऽओषधीभ्यः ॥

कामम्। कामदुघ इति कामऽदुघे। धुक्ष्व। मित्राय। वरुणाय। च। इन्द्राय। अश्विभ्यामित्यश्विऽभ्याम्। पूष्णे। प्रजाभ्य इति प्रजाऽभ्यः। ओषधीभ्यः॥७२॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र के अनुसार कृषि के लिए उपयुक्त हुई यह भूमि हमारे सब कामों का पूरण करनेवाली होती है, इसी से इसे यहाँ 'कामदुघा' कहा है। हे (कामदुघे) = सब मनोरथों को पूरण करनेवाली भूमे ! (कामं धुक्ष्व) = तू हमारे सब मनोरथों को पूरण कर । २. तू (ओषधीभ्यः) = अपने से पैदा की गई ओषधियों के द्वारा (मित्राय) = मित्र के लिए हो, अर्थात् हमारा जीवन इन सोमादि ओषधियों के सेवन से स्नेहवाला हो - मित्रभाववाला हो। ३. (वरुणाय) = तू हमें वरुण बनाने के लिए हो। हमारे जीवन में से द्वेष का निवारण करनेवाली हो। ४. (इन्द्राय) = तू हमें ऐश्वर्य को प्राप्त करने योग्य बनानेवाली हो। ५. (अश्विभ्याम्) = हमारे प्राणापान की शक्ति का वर्धन करनेवाली हो। ६. (पूष्णे) = तू पूषा के लिए हो, अर्थात् मेरे सब अङ्गों का पोषण करनेवाली हो। ७. तथा (प्रजाभ्यः) = सब प्रकार के विकासों के लिए हो। तुझसे उत्पन्न ओषधियाँ प्रयोगपूर्वक सेवित होती हुई मेरी सब शक्तियों का विकास करनेवाली हों।
Essence
भावार्थ- कृषि - कार्य में 'स्नेह है, द्वेष का अभाव है, ऐश्वर्य और प्राणापानशक्ति है तथा सब अङ्गों का पोषण व सब शक्तियों का विकास है।' कृषि के द्वारा यह भूमि कामदुधा बनती है।
Subject
कामदुघा