Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 68

117 Mantra
12/68
Devata- कृषीवलाः कवयो वा देवताः Rishi- विश्वावसुर्ऋषिः Chhand- विराडार्षी Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यु॒नक्त॒ सीरा॒ वि यु॒गा त॑नुध्वं कृ॒ते योनौ॑ वपते॒ह बीज॑म्। गि॒रा च॑ श्रु॒ष्टिः सभ॑रा॒ अस॑न्नो॒ नेदी॑य॒ऽइत्सृ॒ण्यः प॒क्वमेया॑त्॥६८॥

यु॒नक्त॑। सीरा॑। वि। यु॒गा। त॒नु॒ध्व॒म्। कृ॒ते। योनौ॑। व॒प॒त॒। इ॒ह। बीज॑म्। गि॒रा। च॒। श्रु॒ष्टिः। सभ॑रा॒ इति॒ सऽभ॑राः। अस॑त्। नः॒। नेदी॑यः। इत्। सृ॒ण्यः᳖। प॒क्वम्। आ। इ॒या॒त् ॥६८ ॥

Mantra without Swara
युनक्त सीरा वि युगा तनुध्वङ्कृते योनौ वपतेह बीजम् । गिरा च श्रुष्टिः सभराऽअसन्नो नेदीयऽइत्सृण्यः पक्वमेयात् ॥

युनक्त। सीरा। वि। युगा। तनुध्वम्। कृते। योनौ। वपत। इह। बीजम्। गिरा। च। श्रुष्टिः। सभरा इति सऽभराः। असत्। नः। नेदीयः। इत्। सृण्यः। पक्वम्। आ। इयात्॥६८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र की कृषि का ही उल्लेख करते हुए कहते हैं कि- [१] (सीरा युनक्त) = हलों को जोतो । २. (युगा वितनुध्वम्) = जुओं का विस्तार करो। ३. (इह कृते योनौ) = इस संस्कृत भूमिक्षेत्र में (बीजम् वपत) = बीजों को बोवो । ३. (गिरा) = खेती विषयक कर्मों की उपयोगी सुशिक्षित वाणी (च) = और सुविचार से (सभरा:) = भरण-पोषण के तत्त्वोंवाले श्रुष्टिः = अन्न [अन्नं श्रुष्टिः- श०७।२।२।५ ] (नः असत्) = हमारे हों। हम वेदवाणी में प्रतिपादित भोज्य अन्नों को पैदा करनेवाले बनें, उन अन्नों को जिनमें कि भरण-पोषण के तत्त्व पर्याप्त मात्रा में हैं। हमारी कृषि, चाय, तम्बाकू की न हो। ४. हम प्रयत्न करें कि (नेदीय इत्) = थोड़े-से-थोड़े समय में ही (पक्वम्) = पका हुआ धान्य (सृण्यः) = दाँत से कटा जाकर (नः) = हमें (आ इयात्) = सर्वतः प्राप्त हो । ५. 'नेदीय' शब्द कुछ वैज्ञानिक उपाय से कृषि का संकेत करता है जिससे कि फ़सल शीघ्र ही काटी जा सके और हम वर्ष में अधिक-से-अधिक फसलें काट सकें। जैसे सामान्यतः भोजन चार घण्टे में पचता है इसी प्रकार फ़सल चार मास में पक सके और हम साल में तीन फ़सलें ले पाएँ ।
Essence
भावार्थ - खेती ज्ञानपूर्वक करनी है। पौष्टिक अन्न ही उपजाने हैं। 'विश्वावसु' बनने के लिए यह आवश्यक है।
Subject
वेदानुकूल कृषि