Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 67

117 Mantra
12/67
Devata- कृषीवलाः कवयो वा देवताः Rishi- विश्वावसुर्ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सीरा॑ युञ्जन्ति क॒वयो॑ यु॒गा वित॑न्वते॒ पृथ॑क्। धीरा॑ दे॒वेषु॑ सुम्न॒या॥६७॥

सीरा॑। यु॒ञ्ज॒न्ति॒। क॒वयः॑। यु॒गा। वि। त॒न्व॒ते॒। पृथ॑क्। धीराः॑। दे॒वेषु॑। सु॒म्न॒येति॑ सुम्न॒ऽया ॥६७ ॥

Mantra without Swara
सीरा युञ्जन्ति कवयो युगा वितन्वते पृथक् । धीरा देवेषु सूम्नया ॥

सीरा। युञ्जन्ति। कवयः। युगा। वि। तन्वते। पृथक्। धीराः। देवेषु। सुम्नयेति सुम्नऽया॥६७॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र में प्रज्ञापूर्वक कर्मों से धनों के अर्जन का उल्लेख है। सबसे अधिक समझदारी व ईमानदारी का काम 'कृषि' है। प्राचीन संस्कृति में वैश्य के कर्मों का प्रारम्भ 'कृषि' से ही था - ('कृषिगोरक्षवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्')। वेद में कृषि को ही निर्माणात्मक कर्मों का प्रतीक माना गया है ('अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व'), = अतः विश्वावसुओं के कृषिकर्म का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि २. (कवयः) = क्रान्तदर्शी व गहराई तक सोचनेवाले पुरुष जीवन यात्रा के लिए (सीराः) = हलों को (युञ्जन्ति) = जोड़ते हैं। वस्तुत: यह कृषिकर्म अधिक-से-अधिक निर्दोष व अत्यन्त आवश्यक कर्म है- [क] इसमें एक मनुष्य पूर्ण परिश्रम से ही कमाई करता है। [ख] इसमें समाज में बेकारी का प्रश्न उत्पन्न नहीं होता। [ग] धनों के केन्द्रित हो जाने का भय भी उत्पन्न नहीं होता। [घ] उचित व्यायाम के कारण शरीर भी दृढ़ बना रहता है। [ङ] खुली वायु में रहने का प्रसङ्ग बना रहता है। [च] भूमि माता से व प्रकृति से हमारा सम्पर्क रहता है। उत्पन्न हुए विविध अन्न व वनस्पतियों में प्रभु की महिमा दृष्टिगोचर होती है। ३. इन सब कारणों से ही (धीराः) = ये धीर विद्वान् (पृथक्) = अलग-अलग (युगा वितन्वते) = जुओं का विस्तार करते हैं। (देवेषु) = इन्हीं पृथिवी, जल व वायु आदि में ही, अर्थात् इन्हीं के सहारे (सुम्नया) = सुख की प्राप्ति के हेतु से वे कृषि करते हैं, देवों से उनका सम्पर्क बना रहता है। यह देवसम्पर्क हो जाएगा। ही वस्तुतः उन्हें धीर बनाता है। ये बहादुर - brave होते हैं, स्थिर steady वृत्ति के बनते हैं, दृढनिश्चयी strong minded होते हैं, शान्त composed होते हैं, गम्भीर grave बनते हैं, शक्तिशाली energetic होते हैं, समझदार sensible बनते हैं, शिष्टाचारवाले well behaved होते हैं [निरभिमानता के कारण] सभ्य gentle और सदा भद्रता से पेश आते हैं। ४. [क] मन्त्रार्थ में 'पृथक्' शब्द सामूहिक कृषि का कुछ विरोध-सा कर रहा है। सामूहिक कृषि में आलस्य की भावना तो उत्पन्न हो ही सकती है, अतः सभी को अपना कार्य स्वयं करना है। [ख] कृषक जीवन हमें 'धीर' बनाता है। धीर का विस्तृत अर्थ ऊपर अंक '३' में दिया गया है। कृषि उन्हीं को धीर बनाती है जो कवि-विद्वान् हों। आजकल ग़लती से हम कृषि को मूर्खों का पेशा समझ बैठे हैं। मूर्ख कृषि से जीवन का ऐसा निर्माण नहीं कर सकते ।
Essence
भावार्थ - हम कवि बनकर कृषि करें। यह कृषि हमें धीर बनाएगी और हमारा जीवन सुखमय हो जाएगा ।
Subject
धीर कृषक