Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 65

117 Mantra
12/65
Devata- यजमानो देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- आर्षी जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यं ते॑ दे॒वी निर्ऋ॑तिराब॒बन्ध॒ पाशं॑ ग्री॒वास्व॑विचृ॒त्यम्। तं ते॒ विष्या॒म्यायु॑षो॒ न मध्या॒दथै॒तं पि॒तुम॑द्धि॒ प्रसू॑तः। नमो॒ भूत्यै॒ येदं च॒कार॑॥६५॥

यम्। ते॒। दे॒वी। निर्ऋ॑ति॒रिति॒ निःऽऋ॑तिः। आ॒ब॒बन्धेत्या॑ऽब॒बन्ध॑। पाश॑म्। ग्री॒वासु॑। अ॒वि॒चृ॒त्यमित्य॑विऽचृ॒त्यम्। तम्। ते॒। वि। स्या॒मि॒। आयु॑षः। न। मध्या॑त्। अथ॑। ए॒तम्। पि॒तुम्। अ॒द्धि॒। प्रसू॑त॒ इति॒ प्रऽसू॑तः। नमः॑। भूत्यै॑। या। इ॒दम्। च॒कार॑ ॥६५ ॥

Mantra without Swara
यन्ते देवी निरृतिराबबन्ध पाशम्ग्रीवास्वविचृत्यम् । तन्ते वि ष्याम्यायुषो न मध्यादथैतम्पितुमद्धि प्रसूतः । नमो भूत्यै येदं चकार ॥

यम्। ते। देवी। निर्ऋतिरिति निःऽऋतिः। आबबन्धेत्याऽबबन्ध। पाशम्। ग्रीवासु। अविचृत्यमित्यविऽचृत्यम्। तम्। ते। वि। स्यामि। आयुषः। न। मध्यात्। अथ। एतम्। पितुम्। अद्धि। प्रसूत इति प्रऽसूतः। नमः। भूत्यै। या। इदम्। चकार॥६५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (निर्ऋति) = कृच्छ्रापत्ति-कष्ट की प्राप्ति भी 'देवी' है, क्योंकि यह मनुष्य को बुराइयों से हटाकर अच्छाइयों में प्रवृत्त करती है। प्रभु कहते हैं कि हे जीव ! यह देवी (निर्ऋतिः) = दिव्य गुणों को प्राप्त करानेवाली कृच्छ्रापत्ति ते (ग्रीवासु) = तेरी गर्दन में (यम्) = जिस (अविनृत्यम्) = अच्छेद्य (पाशम्) = बन्धन को (आबबन्ध) = बाँधती है, (ते) = तेरे (तम्) = उस बन्धन को (विष्यामि) = मैं समाप्त करता हूँ, जिससे (आयुषो न मध्यात्) = जीवन के मध्य से ही तू चला न जाए। असह्य कष्ट से कहीं मनुष्य अपने को समाप्त ही न कर ले, अतः प्रभु कहते हैं कि मैं तुझे कष्ट में तो डालता हूँ, परन्तु इतना भी अच्छेद्य कष्ट नहीं दे देता कि कहीं तू जीवन को भार समझने लगे और उसे समाप्त ही कर डाले। निरन्तर कष्टों से आयुष्य भी तो क्षीण हो जाता है। २. (अथ) = अब, एक बार कष्ट का अनुभव ले-लेने के बाद तो (प्रसूतः) = वेदवाणी द्वारा प्रेरणा दिया हुआ तू (पितुम्) = अन्न को (अद्धि) = खा, क्योंकि इस अन्न से ही मन बनेगा । सात्त्विक अन्न से मन भी सात्त्विक बनेगा। ('आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः') । ३. सात्त्विक अन्त:करणवाला बनकर यह 'मधुच्छन्दाः' कह उठता है कि (भूत्यै) = परमेश्वर के उस ऐश्वर्य व महिमा के लिए (नमः) = हम नतमस्तक होते हैं या जो प्रभु का ऐश्वर्य (इदम्) = इस अद्भुत संसारक्रम को चकार बनाता है। जीवन का सामान्य क्रम यही होता है कि [क] मनुष्य विषयों की ओर झुकता है। [ख] कष्ट भोगता है। [ग] वास्तविकता को जानकर फिर विषयों से ऊपर उठ जाता है और सात्त्विक अन्न का प्रयोग करते हुए चित्तवृत्ति को सात्त्विक बना लेता है । बन्धन समाप्त हो जाते हैं। निर्ऋति का बन्धन तो विषयों से ऊपर उठाने के लिए ही है। एवं, प्रभु का दिया दण्ड भी हमारी अमरता के लिए ही है। ('मृत्युः अमृतम्') मृत्यु भी अमृत है, निर्ऋति भी भूति [कल्याण] हो जाती है।
Essence
भावार्थ- कष्टों का पाश सुगतमा से नहीं टूटता। यह तो विषय-पाश के छिन्न होने से ही छिन्न होगा। विषय निवृत्ति कष्ट निवृत्ति का कारण है।
Subject
निर्ऋति का पाश, निर्ऋति व भूति