Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 59

117 Mantra
12/59
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अग्ने॒ त्वं पु॑री॒ष्यो रयि॒मान् पु॑ष्टि॒माँ२ऽअ॑सि। शि॒वाः कृ॒त्वा दिशः॒ सर्वाः॒ स्वं योनि॑मि॒हास॑दः॥५९॥

अग्ने॒। त्वम्। पु॑री॒ष्यः᳖। र॒यि॒मानिति॑ रयि॒ऽमान्। पु॒ष्टि॒मानिति॑ पुष्टि॒ऽमान्। अ॒सि॒। शि॒वाः। कृ॒त्वा। दिशः॑। सर्वाः॑। त्वम्। योनि॑म्। इ॒ह। आ। अ॒स॒दः॒ ॥५१ ॥

Mantra without Swara
अग्ने त्वं पुरीष्यो रयिमान्पुष्टिमाँ असि । शिवाः कृत्वा दिशः सर्वाः योनिमिहासदः॥

अग्ने। त्वम्। पुरीष्यः। रयिमानिति रयिऽमान्। पुष्टिमानिति पुष्टिऽमान्। असि। शिवाः। कृत्वा। दिशः। सर्वाः। त्वम्। योनिम्। इह। आ। असदः॥५१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
पिछले मन्त्र की भावना को ही विस्तार से कहते हैं— १. ( अग्ने ) = हे घर की उन्नति के साधक पुरुष! ( त्वम् ) = तू ( पुरीष्यः ) = पालन करनेवालों में उत्तम है। २. ( रयिमान् ) = धनवाला है। बिना धन के यह पालन कैसे कर सकेगा ? ३. ( पुष्टिमान् असि ) = तू पुष्टिवाला है। स्वयं निर्बल होने पर वह औरों के पालन के बोझ को अपने कन्धों पर कैसे ले सकता है ? ४. तू ( सर्वाः दिशः शिवाः कृत्वा ) = सब दिशाओं को कल्याणमय करके, अर्थात् सब दृष्टिकोणों से घर का कल्याण सिद्ध करके ( इह ) = यहाँ ( स्वं योनिम् ) = अपने घर में ( आसदः ) = आसीन हो। खान-पान, वस्त्र-शिक्षा व घर की अन्य सब आवश्यकताओं के दृष्टिकोण से घर में किसी प्रकार की कमी न हो। यह सब दिशाओं का शिव करना है। यदि कोई बच्चा भूख से रो रहा हो, दूसरा ठण्ड में वस्त्राभाव से ठिठुर रहा हो और कोई बीमारी में औषध न मिल सकने से परेशान हो और चौथा स्कूल की फ़ीस के लिए आग्रह कर रहा हो तो यह घर तो सब दिशाओं में अशिव-ही-अशिववाला हो जाएगा। घर को मङ्गलमय बनाना पति का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।
Essence
भावार्थ — गृह के मुखिया को ‘रयि व पुष्टिमान्’ होना चाहिए, जिससे घर में सर्वत्र शिव-ही-शिव हो।
Subject
शिव-ही-शिव