Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 58

117 Mantra
12/58
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- भुरिगुपरिष्टाद् बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
सं वां॒ मना॑सि॒ सं व्र॒ता समु॑ चि॒त्तान्याक॑रम्। अग्ने॑ पुरीष्याधि॒पा भ॑व॒ त्वं न॒ इष॒मूर्जं॒ यज॑मानाय धेहि॥५८॥

सम्। वा॒म्। मना॑सि। सम्। व्र॒ता। सम्। ऊँ॒ इत्यूँ॑। चि॒त्तानि॑। आ। अ॒क॒र॒म्। अग्ने॑। पु॒री॒ष्य॒। अ॒धि॒पा इत्य॑धि॒ऽपाः। भ॒व॒। त्वम्। नः॒। इष॑म्। ऊर्ज॑म्। यज॑मानाय। धे॒हि॒ ॥५८ ॥

Mantra without Swara
सँवाम्मनाँसि सँव्रता समु चित्तान्याकरम् । अग्ने पुरीष्याधिपा भव त्वन्न इषमूर्जँयजमानाय धेहि ॥

सम्। वाम्। मनासि। सम्। व्रता। सम्। ऊँ इत्यूँ। चित्तानि। आ। अकरम्। अग्ने। पुरीष्य। अधिपा इत्यधिऽपाः। भव। त्वम्। नः। इषम्। ऊर्जम्। यजमानाय। धेहि॥५८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ( वाम् ) = तुम दोनों के ( मनांसि ) = मनों को ( सम् आकरम् ) = सङ्गत करता हूँ। तुम्हारे मन मिले हुए हों। उनमें परस्पर विरोध व वैमनस्य न हो। २. ( वाम् ) = तुम दोनों के ( व्रता ) = व्रतों को ( सम् आ अकरम् ) = एक करता हूँ। ‘नियमः पुण्यकं व्रतम्’ = नियम ही व्रत हैं—दोनों के नियम एक-से हों। यदि एक-दूसरे के नियम परस्पर विरुद्ध होंगे तो घर कैसे चल पाएगा ? ३. ( उ ) = और ( चित्तानि ) = तुम्हारे चित्तों को ( सम् आकरम् ) = मेलवाला करता हूँ। ४. अब पति के लिए विशेषरूप से कहते हैं कि हे ( अग्ने ) = सब घर की उन्नति करनेवाले ! ( पुरीष्यम् ) = पालन करनेवालों में उत्तम! ( त्वम् ) = तू ( नः अधिपाः ) = हम सब घरवालों का अधिष्ठाता व रक्षा करनेवाला ( भव ) = हो। ‘पति’ शब्द का अर्थ ही रक्षा करनेवाला है। इसने अपने पति नाम को चरितार्थ करने के लिए गृहरक्षा के भार को अपने कन्धे पर लेना है। ( यजमानाय ) = अपने सम्पर्क में आनेवाले के लिए तू ( इषम् ) = अन्न को ( ऊर्जम् ) = रस को ( धेहि ) = धारण करनेवाला बन। घर के सभी सभ्यों को उचित खान-पान प्राप्त कराने का बोझ गृहपति के कन्धों पर ही होता है। घर में पत्नी है, सन्तान हैं, माता-पिता व अन्य आये-गये जो भी बन्धु हैं, सभी के भोजन का भार इसी ने वहन करना है। यज = [ सङ्गतीकरण ]
Essence
भावार्थ — पति-पत्नी के मन, व्रत व चित्त मिले हुए हों। पति ‘अग्नि व पुरीष्य’ होता हुआ गृह-रक्षक बने। घर में किसी को खान-पान में कमी न रह जाए।
Subject
मनों, व्रतों व चित्तों की एकता