Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 54

117 Mantra
12/54
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विश्वामित्र ऋषिः Chhand- विराडार्षीनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
लो॒कं पृ॑ण छि॒द्रं पृ॒णाथो॑ सीद ध्रु॒वा त्वम्। इ॒न्द्रा॒ग्नी त्वा॒ बृह॒स्पति॑र॒स्मिन् योना॑वसीषदन्॥५४॥

लो॒कम्। पृ॒ण॒। छि॒द्रम्। पृ॒ण॒। अथो॒ऽइत्यथो॑। सी॒द॒। ध्रु॒वा। त्वम्। इ॒न्द्रा॒ग्नीऽइती॑न्द्रा॒ग्नी। त्वा॒। बृह॒स्पतिः॑। अ॒स्मिन्। योनौ॑। अ॒सी॒ष॒द॒न्। अ॒सी॒ष॒द॒न्नित्य॑सीसदन् ॥५४ ॥

Mantra without Swara
लोकम्पृण ञ्छिद्रं पृणाथो सीद धु्रवा त्वम् । इन्द्राग्नी त्वा बृहस्पतिरस्मिन्योनावसीषदन् ॥

लोकम्। पृण। छिद्रम्। पृण। अथोऽइत्यथो। सीद। ध्रुवा। त्वम्। इन्द्राग्नीऽइतीन्द्राग्नी। त्वा। बृहस्पतिः। अस्मिन्। योनौ। असीषदन्। असीषदन्नित्यसीसदन्॥५४॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे पत्नि! तू ( लोकं पृण ) = लोक को तृप्त करनेवाली हो। ( छिद्रं पृण ) = दोष को दूर करनेवाली हो—छेद को भर देनेवाली हो। आदर्श पत्नी अपने व्यवहार से असन्तोष पैदा करने का कारण नहीं बनती। घर में दोषों की वृद्धि नहीं होने देती। २. ( अथ ) = निश्चय से ( त्वम् ) = तू ( ध्रुवा सीद ) = ध्रुव होकर इस घर में बैठ। ध्रुवता के लिए दो बातें आवश्यक हैं—वह अपने व्यवहार से सभी को अप्रसन्न न कर ले तथा दोषों को ही न उघाड़ती फिरे। अपने मधुर शब्दों व व्यवहारों से सभी को सन्तुष्ट रक्खे तथा दोषों को दूर करने का प्रयत्न करे। ३. ( इन्द्राग्नी बृहस्पतिः ) = इन्द्र, अग्नि और बृहस्पति ( त्वा ) = तुझे ( अस्मिन् योनौ ) = इस घर में अथवा सभी के उत्पत्ति स्थान प्रभु में ( असीषदन् ) = स्थित करें—बिठाएँ। ‘इन्द्र’ शब्द जितेन्द्रियता की सूचना देता है—इन्द्रियों का अधिष्ठाता ही ‘इन्द्र’ है। ‘अग्नि’ शब्द अग्रेणी को कहता हुआ अग्रगति = progress का बोध करा रहा है। ‘बृहस्पति’ ऊँचे-से-ऊँचे ज्ञान का सूचक है। ‘बृहस्पति’ ब्रह्मणस्पति है—वेदज्ञान का पति है। एवं, पत्नि जितेन्द्रिय, उन्नति की भावनावाली तथा उच्च ज्ञान को प्राप्त करनेवाली होगी तभी वह घर में स्थिरतापूर्वक निवासवाली हो सकेगी।
Essence
भावार्थ — १. पत्नी घर में सभी को उत्तम भोजनादि व व्यवहार से तृप्त करनेवाली हो। २. दोषों का उद्घाटन न करती फिरे। ३. जितेन्द्रिय हो। ४. उन्नति की भावनावाली हो। तथा ५. ऊँचे-से-ऊँचे ज्ञान को प्राप्त करे।
Subject
लोकं पृण, छिद्रं पृण