Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 45

117 Mantra
12/45
Devata- पितरो देवताः Rishi- सोमाहुतिर्ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अपे॑त॒ वीत॒ वि च॑ सर्प॒तातो॒ येऽत्र॒ स्थ पु॑रा॒णा ये च॒ नूत॑नाः। अदा॑द्य॒मोऽव॒सानं॑ पृथि॒व्याऽअक्र॑न्नि॒मं पि॒तरो॑ लो॒कम॑स्मै॥४५॥

अप॑। इ॒त॒। वि। इ॒त॒। वि। च॒। स॒र्प॒त॒। अतः॑। ये। अत्र॑। स्थ। पु॒रा॒णाः। ये। च॒। नूत॑नाः। अदा॑त्। य॒मः। अ॒व॒सान॒मित्य॑व॒ऽसान॑म्। पृ॒थि॒व्याः। अक्र॑न्। इ॒मम्। पि॒तरः॑। लो॒कम्। अ॒स्मै॒ ॥४५ ॥

Mantra without Swara
अपेत वीत वि च सर्पतातो ये त्र स्थ पुराणा ये च नूतनाः । अदाद्यमो वसानम्पृथिव्या अक्रन्निमम्पितरो लोकमस्मै ॥

अप। इत। वि। इत। वि। च। सर्पत। अतः। ये। अत्र। स्थ। पुराणाः। ये। च। नूतनाः। अदात्। यमः। अवसानमित्यवऽसानम्। पृथिव्याः। अक्रन्। इमम्। पितरः। लोकम्। अस्मै॥४५॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गत मन्त्र की समाप्ति ‘सत्याः सन्तु........कामाः’ पर थी। हमारी इच्छाएँ सत्य हों, असत्य न हों। उसी के स्पष्टीकरण से प्रस्तुत मन्त्र प्रारम्भ होता है। यहाँ मन्त्र का ऋषि ‘सोमाहुति’ मन में उत्पन्न होनेवाली अशुभ इच्छाओं व वासनाओं से कहता है कि ( ये ) = जो भी ( अत्र ) = यहाँ—मेरे हृदय में ( पुराणाः ) = देर से चली आ रही अशुभ इच्छाएँ हैं ( च ) = और ( ये ) = जो ( नूतनाःस्थ ) = नवीन वासनाएँ हैं वे सब ( अतः अप इत ) = यहाँ से दूर चली जाओ। ( च ) = और ( वि+इत ) = विविध दिशाओं में भाग जाओ। ( विसर्पत ) = इधर-उधर विकीर्ण हो जाओ। २. ( यमः ) = जीवन को नियम में रखनेवाला व्यक्ति ( पृथिव्याः ) = शरीर से ( अवसानम् ) = वासनाओं की समाप्ति को ( अदात् ) = दे, अर्थात् नियमित जीवन के द्वारा इन वासनाओं का अन्त कर दे। वासनाओं को समाप्त करने का प्रकार यही है कि हम अपने जीवन की क्रियाओं को बड़ा नियमित कर लें। यह नियमित जीवन ही संयम को सिद्ध करेगा। ३. ( पितरः ) = ज्ञान देनेवाले लोग ( अस्मै ) = इस संयमी पुरुष के लिए ( इमं लोकं अक्रन् ) = इस लोक को करते हैं। यह संसार संयमी पुरुष के लिए है, वही इसका आनन्द उठा सकता है। असंयमी पुरुष को तो यह संसार खा जाता है।
Essence
भावार्थ — हम जीवन से वासनाओं को दूर भगा दें। नियमित जीवन से ही वासना दूर होती है। यह संसार संयमी पुरुष के लिए ही सुखद है।
Subject
वासना-विनाश