Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 39

117 Mantra
12/39
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विरूप ऋषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
पुन॑रा॒सद्य॒ सद॑नम॒पश्च॑ पृथि॒वीम॑ग्ने। शेषे॑ मा॒तुर्यथो॒पस्थे॒ऽन्तर॑स्या शि॒वत॑मः॥३९॥

पुनः॑। आ॒सद्येत्या॒ऽसद्य॑। सद॑नम्। अ॒पः। च॒। पृ॒थि॒वीम्। अ॒ग्ने॒। शेषे॑। मा॒तुः। यथा॑। उ॒पस्थ॒ इत्यु॒पऽस्थे॑। अ॒न्तः। अ॒स्या॒म्। शि॒वत॑म॒ इति॑ शि॒वऽत॑मः ॥३९ ॥

Mantra without Swara
पुनरासद्य सदनमपश्च पृथिवीमग्ने । शेषे मातुर्यथोपस्थे न्तरस्याँ शिवतमः ॥

पुनः। आसद्येत्याऽसद्य। सदनम्। अपः। च। पृथिवीम्। अग्ने। शेषे। मातुः। यथा। उपस्थ इत्युपऽस्थे। अन्तः। अस्याम्। शिवतम इति शिवऽतमः॥३९॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
गत मन्त्र की भावना का ही विस्तार करते हुए प्रभु ‘विरूप’ से कहते हैं कि [ १ ] ज्ञान-प्राप्ति के बाद ( पुनः ) = फिर ( सदनम् ) = सम्पूर्ण संसार के कारण उस ब्रह्म में ( अपः ) = प्रजाओं व कर्मों में ( पृथिवी च ) = और विशाल हृदयान्तरिक्ष में ( आसद्य ) = स्थित होकर हे ( अग्ने ) = प्रकाश के प्रसारक विद्वन्! तू ( अस्यां अन्तः ) = इस प्रजा में ( शेषे ) = इस प्रकार निवास करता है ( यथा ) = जैसे कोई बालक ( मातुः उपस्थे ) = माता की गोद में शयन करता हो। तू प्रजाओं से दूर नहीं भागता। प्रजाओं में निवास करता हुआ तू अशान्ति अनुभव नहीं करता। २. तू इन प्रजाओं में ही स्थित हुआ ( शिवतमः ) = उनका अधिक-से-अधिक कल्याण करता है। अज्ञानवश गालियाँ देनेवालों को भी तू आशीर्वाद ही देता है।
Essence
भावार्थ — विद्वान् संन्यासी प्रजाओं में ज्ञान फैलाते हुए उनका अधिक-से-अधिक कल्याण करता है।
Subject
माता की गोद में