Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 38

117 Mantra
12/38
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विरूप ऋषिः Chhand- निचृदार्ष्यनुस्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्र॒सद्य॒ भस्म॑ना॒ योनि॑म॒पश्च॑ पृथि॒वीम॑ग्ने। स॒ꣳसृज्य॑ मा॒तृभि॒ष्ट्वं ज्योति॑ष्मा॒न् पुन॒रास॑दः॥३८॥

प्र॒सद्येति॑ प्र॒ऽसद्य॑। भस्म॑ना। योनि॑म्। अ॒पः। च॒। पृ॒थि॒वीम्। अ॒ग्ने॒। सं॒ऽसृज्येति॑ स॒म्ऽसृज्य॑। मा॒तृभि॒रिति॑ मा॒तृऽभिः॑। त्वम्। ज्योति॑ष्मान्। पुनः॑। आ। अ॒स॒दः॒ ॥३८ ॥

Mantra without Swara
प्रसद्य भस्मना योनिमपश्च पृथिवीमग्ने । सँसृज्य मातृभिष्ट्वञ्ज्योतिष्मान्पुनरासदः ॥

प्रसद्येति प्रऽसद्य। भस्मना। योनिम्। अपः। च। पृथिवीम्। अग्ने। संऽसृज्येति सम्ऽसृज्य। मातृभिरिति मातृऽभिः। त्वम्। ज्योतिष्मान्। पुनः। आ। असदः॥३८॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ( भस्मना ) = [ भस दीप्तौ, प्रदीपकं तेजः—द० ] अपने ज्ञान के दीप्त तेज से ( योनिः ) = मूलस्थान ब्रह्म में ( प्रसद्य ) = स्थित होकर, अर्थात् प्रभु की उपासना करके हे ( अग्ने ) = सबके लिए मार्ग दिखानेवाले विद्वन्! तू ( अपः ) = प्रजाओं में व कर्मों में स्थित हो, अर्थात् तेरे दिन का प्रारम्भ सदा प्रभु के ध्यान से हो। यह प्रभु-दर्शन तुझे ज्ञान से ही तो होगा, अतः तूने अधिक-से-अधिक ज्ञान को प्राप्त करने का प्रयत्न करना। यह दीप्त-ज्ञान का तेज तुझे ब्रह्मनिष्ठ बनाएगा, परन्तु तूने सदा समाधि के आनन्द में ही न उलझे रहना। तूने अपने ज्ञान को प्रजाओं में भी फैलाने के लिए यत्नशील होना। तेरा जीवन बड़ा क्रियाशील हो। ब्रह्मज्ञानी अकर्मण्य नहीं होता। २. तूने इस ज्ञान-प्रसार के कार्य को करते हुए ( पृथिवीम् ) = [ प्रथ विस्तारे ] विशाल हृदय-प्रदेश में स्थित होना। तेरा हृदय विशाल होगा तभी तू सभी को अपनी ‘मैं’ में समाविष्ट करके वसुधा को अपना परिवार बना पाएगा। ३. ( त्वम् ) = तू ( मातृभिः ) = जीवन का निर्माण करनेवाले ‘माता-पिता व आचार्य’ के ( संसृज्य ) = सम्पर्क में आकर ( ज्योतिष्मान् ) = उत्तम ज्ञान की ज्योतिवाला बना है, ( पुनः ) = इस प्रकार ज्योतिष्मान् बनकर ही फिर तू ( आसदः ) = उस ब्रह्म में स्थित हो, प्रजा व कर्मों में स्थित हो तथा विशाल हृदयान्तरिक्ष में स्थित हो [ योनिम्, अपः, पृथिवीम् ]। जिसका जीवन उत्तम माता-पिता व आचार्य इन निर्माताओं के सम्पर्क में नहीं आता, उसे ज्ञान भी प्राप्त नहीं होता और उसके लिए ब्रह्मनिष्ठ होना सम्भव नहीं होता।
Essence
भावार्थ — विद्वान् अपने जीवन को ज्ञान-ज्योति से दीप्त करे। ब्रह्मदर्शन करता हुआ वह ईशचिन्तन से दिन का आरम्भ करे, प्रजाओं में ज्ञान-प्रसार करता हुआ उदार हृदय बने और दिनावसान पर पुनः प्रभु का ध्यान करता हुआ रात्रिशयन में चला जाए।
Subject
योनिम्, अपः, पृथिवीम्