Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 36

117 Mantra
12/36
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विरूप ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒प्स्वग्ने॒ सधि॒ष्टव॒ सौष॑धी॒रनु॑ रुध्यसे। गर्भे॒ सञ्जा॑यसे॒ पुनः॑॥३६॥

अ॒प्स्वित्य॒प्ऽसु। अ॒ग्ने॒। सधिः॑। तव॑। सः। ओष॑धीः। अनु॑। रु॒ध्य॒से॒। गर्भे॑। सन्। जा॒य॒से॒। पुन॒रिति॒ पुनः॑ ॥२६ ॥

Mantra without Swara
अप्स्वग्ने सधिष्टव सौषधीरनु रुध्यसे । गर्भे सन्जायसे पुनः ॥

अप्स्वित्यप्ऽसु। अग्ने। सधिः। तव। सः। ओषधीः। अनु। रुध्यसे। गर्भे। सन्। जायसे। पुनरिति पुनः॥२६॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे ( अग्ने ) = ज्ञान के प्रकाशवाले, प्रजाओं को उन्नति-पथ पर ले-चलनेवाले! ( विरूप ) = विशिष्ट रूपवाले तेजस्विन्! ( तव ) = तेरा ( अप्सु ) = प्रजाओं में ( सधिः ) = समान स्थान है, अर्थात् जहाँ प्रजाएँ हैं, वहीं तुझे भी होना है, प्रजाओं में रहते हुए उन्हें ज्ञान देने के लिए सदा यत्नशील रहना है। २. ( सः ) = वह तू प्रजाओं को ज्ञान देता हुआ ( सौषधीः ) = यव आदि [ यवाद्याः— म० ] ओषधियों का ही ( अनुरुध्यसे ) = [ स्वीकरोषि—म० ] स्वीकार करता है। तेरा भोजन सात्त्विक व वानस्पतिक ही होता है। ३ [ क ] ( गर्भे सन् ) = प्रजाओं के मध्य में रहता हुआ तू ( पुनः ) = फिर ( जायसे ) = बाहर हो जाता है, अर्थात् निरन्तर आगे चलते जाने के कारण यह सदा किसी एक स्थान पर ठहरा नहीं रहता। आज यहाँ की प्रजा में है, कल इससे बाहर होकर अन्यत्र चला गया है। [ ख ] अथवा ( गर्भे सन् ) = प्रति वर्ष चौमासे में गर्भ में, अदृश्यरूप में, कहीं एकान्त अज्ञात स्थान में ठहरकर तू ( पुनः ) = फिर ( जायसे ) = प्रकट हो जाता है और अपने अन्दर ग्रहण किये हुए ज्ञान का प्रसार करता है।
Essence
भावार्थ — आदर्श पुरुष वही है जो प्रजाओं के साथ ही रहता है, वानस्पतिक भोजन करता है। चार मास एकान्त में अपने को ज्ञान से भरकर फिर ज्ञान-प्रसार के लिए बाहर आ जाता है।
Subject
आदर्श प्रचारक