Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 31

117 Mantra
12/31
Devata- अग्निर्देवता Rishi- तापस ऋषिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
उदु॑ त्वा॒ विश्वे॑ दे॒वाऽअग्ने॒ भर॑न्तु॒ चित्ति॑भिः। स नो॑ भव शि॒वस्त्वꣳ सु॒प्रती॑को वि॒भाव॑सुः॥३१॥

उत्। ऊँ॒इत्यूँ॑। त्वा॒। विश्वे॑। दे॒वाः। अग्ने॑। भर॑न्तु। चित्ति॑भि॒रिति॒ चित्ति॑ऽभिः। सः। नः॒। भ॒व॒। शि॒वः। त्वम्। सु॒प्रती॑क॒ इति॑ सु॒ऽप्रती॑कः। वि॒भाव॑सु॒रिति॑ वि॒भाऽव॑सुः ॥३१ ॥

Mantra without Swara
उदु त्वा विश्वे देवाऽअग्ने भरन्तु चित्तिभिः । स नो भव शिवस्त्वँ सुप्रतीको विभावसुः ॥

उत्। ऊँइत्यूँ। त्वा। विश्वे। देवाः। अग्ने। भरन्तु। चित्तिभिरिति चित्तिऽभिः। सः। नः। भव। शिवः। त्वम्। सुप्रतीक इति सुऽप्रतीकः। विभावसुरिति विभाऽवसुः॥३१॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र की भावना के अनुसार मनुष्य अपने ज्ञान को निरन्तर बढ़ाए, नैर्मल्य की साधना करे, दान देकर यज्ञशेष को खाने की वृत्तिवाला बने।

२. इस वृत्तिवाला व्यक्ति ( उत् उ ) = निश्चय से विषय-वासनाओं से ऊपर उठता है [ उत् = out ]। यह विषय-वासना से ऊपर उठना ही वास्तविक तपस्या है, अतः मन्त्र का ऋषि ‘तापस’ नामवाला हो गया है।

३. ( अग्ने ) = हे आगे बढ़नेवाले! ( त्वा ) = तुझ तापस को ( विश्वे देवाः ) = सब देव ( चित्तिभिः ) = ज्ञानों से ( भरन्तु ) = भर दें। यह तापस ज्ञानियों के सम्पर्क में आता है। यह ज्ञानियों का सम्पर्क इसे अधिकाधिक ज्ञानी बनाता है। उनके सम्पर्क में इसकी बुद्धि विशिष्ट और विशिष्टतर होती चलती है।

५. ( सः ) = वह ( विभावसुः ) = ज्ञान-धनवाला ( सुप्रतीकः ) = शोभन मुखवाला या प्रियदर्शनवाला ( त्वम् ) = तू ( नः ) = हमारे लिए ( शिवः ) = कल्याण को प्राप्त करानेवाला ( भव ) = हो। यह तापस प्रजाओं में विचरता है। उन प्रजाओं के लिए अपने ज्ञान-धन को विकीर्ण करता है और इस ज्ञान का प्रसार यह अत्यन्त माधुर्य के साथ करता है—सबके लिए यह सुप्रतीक = प्रियदर्शन होता है। इसके मुख पर मानस शान्ति का प्रतिबिम्ब दृष्टिगोचर होता है।
Essence
भावार्थ — एक परिव्राजक प्रचारक को तपस्वी, ज्ञानी व प्रियदर्शन होना चाहिए।
Subject
ज्ञानी - प्रियदर्शन