Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 30

117 Mantra
12/30
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विरूपाक्ष ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स॒मिधा॒ग्निं दु॑वस्यत घृ॒तैर्बो॑धय॒ताति॑थिम्। आस्मि॑न् ह॒व्या जु॑होतन॥३०॥

स॒मिधेति॑ स॒म्ऽइधा॑। अ॒ग्निम्। दु॒व॒स्य॒त॒। घृ॒तैः। बो॒ध॒य॒त॒। अति॑थिम्। आ। अ॒स्मि॒न्। ह॒व्या। जु॒हो॒त॒न॒ ॥३० ॥

Mantra without Swara
समिधाग्निन्दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम् । आस्मिन्हव्या जुहोतन् ॥

समिधेति सम्ऽइधा। अग्निम्। दुवस्यत। घृतैः। बोधयत। अतिथिम्। आ। अस्मिन्। हव्या। जुहोतन॥३०॥

Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Yajurveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. पिछले मन्त्र की समाप्ति इस बात पर थी कि सब देव हमारे अङ्गों में अपनी-अपनी सम्पत्ति को धारण कर उन्हें सुवीर बनाएँ। वे वीरतापूर्ण अंश इस मनुष्य को ‘विरूपाक्ष’ बनाते हैं—विशिष्ट रूपवाली हैं इन्द्रियाँ जिसकी। इस विरूपाक्ष का कथन है कि २. ( समिधा ) = ज्ञान की दीप्ति से ( अग्निम् ) = उस अग्रेणी प्रभु की ( दुवस्यत ) = परिचर्या करो। वस्तुतः प्रभु की सच्ची उपासना ज्ञान से ही होती है। ज्ञानीभक्त ही प्रभु को आत्मतुल्य प्रतीत होता है। २. ( घृतैः ) = मलों के क्षरण व विद्रावण से, दीप्त अन्तःकरणवृत्तियों से ( अतिथिम् ) = उस [ अत सातत्यगमने ] निरन्तर प्राप्त, सदा हृदय में विद्यमान प्रभु को ( बोधयत ) = [ चेतयत ] जानो। उस प्रभु का ज्ञान तभी होता है जब हमारे हृदयों पर से मल का आवरण दूर हो जाता है। प्रभु तो उपस्थित हैं ही, परन्तु हृदयों के मलावृत्त होने से उसका ज्ञान नहीं होता। मल हटा और प्रभु का दर्शन हुआ। ३. ( अस्मिन् ) = इस प्रभु में स्थित हुए ( हव्या ) = दातुमर्ह—देने योग्य पदार्थों को ( आजुहोतन ) = दान में दो। प्रभु में स्थित हुए, अर्थात् प्रभु को कभी न भूलते हुए हम सदा दान देनेवाले बनें। देकर बचे हुए को खानेवाले बनें। यह यज्ञशेष का सेवन ही प्रभु-अर्चन हो जाता है। वस्तुतः प्रभु-स्मरण करनेवाला व्यक्ति वैषयिक वृत्ति का तो बनता ही नहीं। यह विषय-वासनाओं से ऊपर उठा हुआ व्यक्ति ‘विरूपाक्ष’ क्यों न बनेगा।
Essence
भावार्थ — १. ज्ञान-दीप्ति से हम प्रभु की परिचर्या करें। २. नैर्मल्य से प्रभु के प्रकाश को देखें। ३. प्रभु-दर्शन करते हुए सदा देकर खाएँ—यज्ञशेष का सेवन करें।
Subject
‘विरूपाक्ष’